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पानीपत का द्वितीय युद्ध कब हुआ था

पानीपत जो कि हरियाणा राज्य में स्थित एक जिला है को इतिहास के तीन अहम युद्धों के लिए जाना जाता है। पानीपत का द्वितीय युद्ध 5 नवंबर 1556 को हुआ था। यह युद्ध इसी स्थान पर हुए प्रथम युद्ध से 30 वर्ष पश्चात हुआ तथा इसके परिणाम ने भारत के इतिहास को एक नई दिशा में मोड़ कर रख दिया। मुग़लों का साम्राज्य जिसकी नींव बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में जीत के पश्चात रखी थी वह साम्राज्य बाबर के पुत्र तथा उत्तराधिकारी हुमायूँ के शासनकाल में डगमगा गया। पानीपत की विशेष बात यह थी कि उसमें लड़े गए युद्धों में मुग़लों को रोचक तरीकों से जीत मिली। बाबर भी अपनी छोटी सेना लेकर इब्राहिम लोधी को हराने में कामयाब हुआ था वहीं द्वितीय युद्ध में हुमायूँ के पुत्र अकबर से तीन गुना ज्यादा सेना लेकर युद्ध लड़ने आए हेमू को भी हार का मुँह देखना पड़ा। प्रथम युद्ध के पश्चात बाबर ने मुग़ल साम्राज्य को खड़ा तो कर दिया था परन्तु वह ज्यादा दिन तक शासन नही कर सका। मात्र 4 वर्ष शासन करने के पश्चात वर्ष 1530 में बाबर की मृत्यु हो गई। बाबर की मृत्यु के पश्चात हुमायूँ ने गद्दी सम्भाली। इतिहास हुमायूँ को एक डगमगाते हुए शासक के रूप में जानता है क्योंकि वह एक जीता हुआ विशाल राज्य अपने पिता की सेना में कार्यरत रहे एक सैनिक शेर शाह सूरी से हार गया था। शेर शाह सूरी ने अपनी कुशलता से हुमायूँ को हराकर उत्तर भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। 1540 में सूरी साम्राज्य के संस्थापक बने शेर शाह सूरी मात्र 5 वर्ष ही शासन कर सके। 1545 में चंदेल राजपूतों से लड़ते हुए शेर शाह सूरी की मृत्यु हो गई। यहीं से पानीपत के द्वितीय युद्ध की नींव पड़ी। शेर शाह सूरी के उत्तराधिकारी तथा सूरी साम्राज्य के चौथे किन्तु अयोग्य शासक आदिल शाह का हिन्दू मंत्री हेमचन्द्र विक्रमादित्य जिसे इतिहास हेमू के नाम से जानता है के समय तक सूरी वंश को स्थापित हुए 16 वर्ष हो चुके थे। इसी बीच हुमायूँ की मृत्यु की खबर हेमू तक पहुँची जिसका हेमू ने फायदा उठाना चाहा। जब इस बात की खबर काबुल में बैठे अकबर और उसके सरंक्षक बैरम खान को लगी तो उन्होंने अपनी छोटी सेनापानीपत जो कि हरियाणा राज्य में स्थित एक जिला है को इतिहास के तीन अहम युद्धों के लिए जाना जाता है। पानीपत का द्वितीय युद्ध 5 नवंबर 1556 को हुआ था। पानीपत का द्वितीय युद्ध इसी स्थान पर हुए प्रथम युद्ध से 30 वर्ष पश्चात हुआ तथा इसके परिणाम ने भारत के इतिहास को एक नई दिशा में मोड़ कर रख दिया। मुग़लों का साम्राज्य जिसकी नींव बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में जीत के पश्चात रखी थी वह साम्राज्य बाबर के पुत्र तथा उत्तराधिकारी हुमायूँ के शासनकाल में डगमगा गया था। पानीपत की विशेष बात यह थी कि उसमें लड़े गए युद्धों में मुग़लों को रोचक तरीकों से जीत मिली। बाबर भी अपनी छोटी सेना लेकर इब्राहिम लोधी को हराने में कामयाब हुआ था वहीं द्वितीय युद्ध में अकबर से तीन गुना ज्यादा सेना लेकर युद्ध लड़ने आए हेमू को भी हार का मुँह देखना पड़ा था। प्रथम युद्ध के पश्चात जब बाबर ने मुग़ल साम्राज्य को खड़ा तो कर दिया था परन्तु वह ज्यादा दिन तक शासन नही कर सका था। मात्र 4 वर्ष शासन करने के पश्चात वर्ष 1530 में बाबर की मृत्यु हो गई। बाबर की मृत्यु के पश्चात हुमायूँ ने गद्दी सम्भाली। इतिहास हुमायूँ को एक डगमगाते हुए नेता के रूप में जानता है क्योंकि वह एक जीता हुआ विशाल राज्य अपने पिता की सेना में कार्यरत रहे एक सैनिक शेर शाह सूरी से हार गया था। शेर शाह सूरी ने अपनी कुशलता से हुमायूँ को हराकर उत्तर भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। 1540 में सूरी साम्राज्य के शासक बने शेर शाह सूरी मात्र 5 वर्ष ही शासन कर सके। 1545 में चंदेल राजपूतों से लड़ते हुए शेर शाह सूरी की मृत्यु ही गई। यहीं से पानीपत के द्वितीय युद्ध की नींव पड़ी। शेर शाह सूरी के उत्तराधिकारी तथा सूरी साम्राज्य के चौथे किन्तु अयोग्य शासक आदिल शाह का हिन्दू मंत्री हेमचन्द्र विक्रमादित्य जिसे इतिहास हेमू के नाम से जानता है के समय तक सूरी वंश को स्थापित हुए 16 वर्ष हो चुके थे। इसी बीच हुमायूँ की मृत्यु की खबर हेमू तक पहुँची जिसका हेमू ने फायदा उठाना चाहा। जब इस बात की खबर काबुल में बैठे अकबर और उसके सरंक्षक बैरम खान को लगी तो उन्होंने अपनी छोटी सेना लेकर दिल्ली की तरफ कूच कर दिया। इधर हेमू भी आक्रमणकारियों से निपटने के लिए तैयार बैठा था तथा वह भी अपनी सेना लेकर पानीपत की तरफ बढा। दोनों सेनाएं 5 नवंबर 1556 को पानीपत में आमने सामने आ गई। अब जो युद्ध होने वाला था उसे इतिहास ने पानीपत के द्वितीय युद्ध के नाम से जाना। यह युद्ध उस समय के बुद्धिजीवियों द्वारा एक तरफा माना जा रहा था क्योंकि हेमू की सेना अकबर से तीन गुना अधिक थी तथा उसे पास हाथी व तोपों का जखीरा था। हेमू की जीत लगभग तय थी और शुरू में हुआ भी यही हेमू अकबर पर भारी पड़ने लगा। अकबर का भावुक होकर दिल्ली पर कूच करने का फैसला समस्त मुग़ल साम्राज्य के अंत का कारण बनने वाला था। किन्तु इतिहास की तस्वीर उस तरह से नही छपी जिस तरह इसे सोचा जा रहा था। अचानक लड़ते लड़ते हेमू की आँख में एक तीर जा लगा और वह अचेत होकर जमीन पर गिर गया। हेमू की सेना कल लगा कि वह मर चुका है और धीरे धीरे यह खबर हेमू की सेना में फैल गई। वीरता से लड़ रही सेना के हौंसले अपने सेनानायक को मरा हुआ पाकर पस्त हो गए तथा सैनिक मैदान छोड़कर भागने लगे। अकबर की अविश्वसनीय रूप से विजय हो गई। इस प्रकार डूबा हुआ मुगल साम्राज्य एक बार फिर दिल्ली पर अपनी जड़ें जमाने मे कामयाब हो गया। यह दूसरी बार था जब पानीपत ने मुगलों के भाग्य में राजयोग लिख दिया था। बैरम खान ने अचेत हेमू को गला रेत कर मार दिया तथा उसके सभी शुभचिंतकों को मार कर दिल्ली में अकबर का राजतिलक कर दिया। हेमू के पिता को धर्म परिवर्तन करने पर मजबूर किया गया तथा उनके मना करने पर उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया। यहाँ से मुग़ल साम्राज्य की पुनः शुरुआत हुई। पानीपत के द्वितीय युद्ध से जुड़े अन्य सामान्य ज्ञान प्रश्न निम्न हैं:

1). पानीपत के द्वितीय युद्ध में हेमू क्यों लड़ा जबकि सूरी साम्राज्य का शासक आदिल शाह था?
आदिल खान एक अयोग्य शासक था तथा अपने कार्य हेमू को सौंपे हुए था।

2). हुमायूँ की मृत्यु कब हुई थी जो अकबर और हेमू के मध्य युद्ध का कारण बनी?
4 मार्च 1556 को (हुमायूँ की मृत्यु के 8 माह पश्चात पानीपत का द्वितीय युद्ध हुआ)

3). पानीपत के द्वितीय युद्ध मे विजयी होकर मुग़ल साम्राज्य को भारत में पुनः स्थापित करने वाला अकबर किस राजवंश से सबंध रखता था?
तैमूर राजवंश

4). पानीपत के द्वितीय युद्ध में कितने सैनिकों ने भाग लिया था?
40 हज़ार सैनिकों ने (जिसमें अकबर के 10 हज़ार तथा हेमू के 30 हज़ार सैनिक थे। हेमू के सैनिकों की संख्या अकबर के सैनिकों से तीन गुना ज्यादा थी)
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