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तिरंगे का इतिहास Indian Flag History in Hindi

प्रत्येक देश का अपना एक अलग ध्वज है जो उस देश के मान सम्मान का प्रतीक होता है किसी भी देश के नागरिक के मन में अपने देश के ध्वज के प्रति आस्था, निष्ठा तथा बलिदान की भावना रहती है और यही भावना देश की शक्ति होती है खुले आसमान में लाहरा रहा ध्वज देश की स्वतंत्रता को दर्शाता है और इस बात का प्रतीक है कि सम्पूर्ण आकाश है उसके विकास के लिए, स्वतन्त्र रहने के लिए तथा यह ध्वज दर्शाता है कि देश पर किसी प्रकार की कोई विवशता नही है। प्रत्येक देश की तरह भारत का भी अपना ध्वज है जो इस देश का गौरव है। भारत के झण्डे को तिरंगा कहा जाता है क्योंकि इसमें तीन रंग केसरिया, सफेद व हरा होते हैं इस पृष्ठ पर आप तिरंगे के शुरुआती इतिहास से लेकर अब तक का सफर तथा तिरंगे के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करेंगे तो आइए सबसे पहले जानते हैं कि भारत देश की शान तिरंगे को बनाने का सौभाग्य किसे प्राप्त हुआ?

वर्तमान भारतीय तिरंगे को बनाने का गौरव पिंगली वेंकय्या को मिला। हालांकि उनके द्वारा बनाए गए ध्वज में कुछ परिवर्तन किए गए किन्तु आजाद भारत के लिए ध्वज की कल्पना उन्ही द्वारा की गई थी। 2 अगस्त 1876 को आंध्रा प्रदेश के मासुलिपत्तनम में जन्में पिंगली वेंकय्या ब्रिटिश भारतीय सेना में सैनिक थे ब्रिटिश भारतीय सेना का हिस्सा होने के कारण उनके मन में जहाँ भारत के लिए अगाढ़ प्रेम था वहीं इसकी गुलामी से वो त्रस्त भी थे। वे 19 वर्ष की आयु में सेना में भर्ती हुए तथा एक स्वतंत्र भारत के सपने को संजोया। उनके इस अधूरे स्वप्न को आशा तब मिली जब उनकी मुलाकात भारत की आज़ादी के सबसे बड़े नाम महात्मा गाँधी से हुई। उनकी गाँधी जी से यह मुलाकात अफ्रीका में एंग्लो-बोअर युद्ध के समय हुई थी तथा वहीं से वेंकय्या का रूख काँग्रेस की ओर मुड़ा। कांग्रेस भारत की आज़ादी से पूर्व एक मात्र राष्ट्र स्तर पर जाना जाने वाला दल था। काँग्रेस की भारत की आज़ादी में सबसे बड़ी भूमिका रही है। पिंगली वेंकय्या ने काँग्रेस के लिए जिस ध्वज का निर्माण किया था उसी का भविष्य रूप आज का भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के रूप में देखते हैं जिसमें कुछ परिवर्तन किए गए हैं। 1947 में भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाए गए तिरंगे में अशोक चक्र सबसे आखिर में जोड़ा गया जो इसी परिवर्तन क्रम के चलते हुआ था अशोक चक्र से पूर्व ध्वज में चलते चरखे का चिह्न था जिसे बाद में अशोक चक्र से विस्थापित किया गया। यह कोई पहली बार नही था जब ध्वज में कोई बदलाव किया गया बल्कि भारतीय ध्वज बहुत से रूपों से होते हुए वर्तमान रूप धारण किया है इन सभी बदलावों के बारे में आपको जानकारी देंगे लेकिन इससे पहले आइए जानते हैं भारतीय ध्वज का तिरंगा नाम कैसे पड़ा।

भारतीय ध्वज में पिंगली वेंकय्या ने दो रंग सुझाए थे लाल तथा हरा परन्तु गांधी जी द्वारा इसमें सफेद रंग जोड़ने को कहा गया। उस समय ध्वज के तीन रंगों को केसरिया, सफेद व हरा में तब्दील किए जाने के बाद केसरिया रंग सबसे ऊपर रखा गया, सफेद रंग बीच में तथा हरा रंग सबसे नीचे रखा गया। इस प्रकार भारतीय ध्वज तीन रंगा बन गया तथा इसी तीन रंगा शब्द से तिरंगा बना। आज हिन्दी का तिरंगा या अंग्रेजी का ट्राईकलर शब्द विश्व में कहीं भी प्रयोग किया जाता है तो इसका अर्थ भारतीय ध्वज ही होता है हालांकि बहुत से देशों के ध्वज तीन रंगों में हैं किन्तु तिरंगा शब्द केवल भारतीय ध्वज के रूप में ही प्रचलित है। यद्दपि यह शब्द बहुत प्रचलित है लेकिन भारतीय ध्वज का आधिकारिक नाम कभींनही रहा तथा भारतीय जनता इस नाम से परिचित भी नही थी परन्तु धीरे धीरे काँग्रेस के प्रयोगों व मोर्चा दलों के प्रभाव से यह ध्वज भारतीय जनों में आम होता चला गया। इस ध्वज को लेकर आजादी के लिए मार्च निकाले जाने के कारण धीरे धीरे तिरंगा शब्द जयकारों में गूंजने लगा। "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा" गीत जो आज झण्डा गीत के रूप में जाना जाता है ने इस शब्द को भारतीय जनों में आम कर दिया। झण्डा गीत की जानकारी भी इस पृष्ठ पर आगे दी गई है। अब जब इस प्रकार के देशभक्ति गीतों में तिरंगा शब्द प्रयोग होने लगा तो लोगों ने भारतीय ध्वज कहने की बजाए तिरंगा कहना शुरू कर दिया। धीरे धीरे यह शब्द विश्व स्तर पर फैल गया। वर्ष 1993 में बॉलीवुड ने "तिरंगा" नाम से एक फ़िल्म का निर्माण किया जिसमें नाना पाटेकर, राजकुमार तथा ममता कुलकर्णी ने अहम भूमिका निभाई। देशभक्ति पर आधारित इस फ़िल्म ने काफी सुर्खियां बटोरी। आइए अब जानते हैं तिरंगे में प्रयुक्त तीन रंगों का महत्व।

भारतीय ध्वज तीन रंगों का प्रयोग गाँधी जी के कहने कहने पर हुआ दरअसल अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी का वार्षिक स्तर वर्ष 1921 में बेजवाड़ा में हो रहा था (जिसे आज विजयवाड़ा के नाम से जाना जाता है) में पिंगली वेंकय्या ने गाँधी जी को एक झण्डा बनाकर दिया यह लाल तथा हरे रंग का था। आशय पूछने पर उसने बताया कि इस झण्डे में लाल रंग हिन्दू तथा हरा रंग मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है। इस पर गाँधी जी ने सुझाव दिया कि इसमें सफेद रंग और जोड़ा जाए जो शेष समुदायों का प्रतिनिधित्व करता हो व देश की प्रगति को दर्शाता एक चलता चरखा भी इसमें शामिल किया जाए। गाँधी जी के इस सुझाव के बाद नया झण्डा बनाया गया जिसमें सफेद सबसे ऊपर बीच में हरा तथा सबसे नीचे लाल रंग था। बीच मे नीले रंग का एक बड़ा चरखा बनाया गया जिसका आधार भाग लाल में, मध्य भाग हरे में तथा ऊपरी भाग सफेद पट्टी में आता था जो देश की प्रगति में सभी समुदायों की भागीदारी को दर्शा रहा था। अब यहाँ तीनों रंग ध्वज में आ चुके थे किंतु ध्वज को अभी भी दो और परिवर्तनों से गुजरना था। तिरंगे में पहला परिवर्तन 1931 में किया गया जिसमें रंगों के करण तथा चरखे के आकार में परिवर्तन किया गया। अब लाल रंग केसरिया रूप में सबसे ऊपर, सफेद मध्य में तथा हरा रंग सबसे नीचे था। यह तिरंगा वर्तमान के रूप में ही था अंतर था तो केवल अशोक चक्र के स्थान पर चरखे का। सफेद रंग की पट्टी में चलता चरखा बनाया गया अब इस चरखे का आकार छोटा था तथा केवल सफेद रंग की पट्टी की सीमितता में छपा था। इस ध्वज को वर्तमान तिरंगे का जनक कहा जाता है। अब जब तिरंगा हमारे देश का ध्वज बन गया तो इसमें केवल अशोक चक्र का आगमन बाकी था जो कि वर्ष 1947 में आजादी से कुछ ही दिन पूर्व हुआ था। अब तिरंगे का न केवल रूप बदला था बल्कि इसके रंगों को साम्प्रदाय से हटकर एक नए तरीके से अर्थ मिले जिनका अनुसरणी हम आज भी करते हैं तिरंगे में स्थित तीन रंगों का अर्थ इस प्रकार है:

Indian Flag Three Colors Meaning in Hindi:

केसरिया रंग: सबसे ऊपरी पट्टी में स्थित केसरिया रंग शौर्य और बलिदान का प्रतीक है। यह देश हितों के लिए सदैव ततपर रहने व देश की आन बान शान के लिए मर मिटने की भावना को दर्शाता है।

सफेद रंग: मध्य पट्टी में स्थित सफेद रंग शांति तथा सत्य का प्रतीक है। यह रंग देश में शांति के लिए प्रतिबद्धता तथा सत्य की राह पर चलने की भावना को दर्शाता है।

हरा रंग: यह रंग देश की भूमि की हरियाली तथा पवित्रता का प्रतीक है। यह रंग कृषि प्रधान देश की भूमि जहाँ भूमि को माँ की संज्ञा दी जाती है और पूजा जाता है के प्रति भावनाओं को दर्शाता है।

अशोक चक्र: नीले रंग में बना अशोक चक्र जीवन के सदैव चलते रहने व प्रगति करने का प्रतीक है। प्रगतिशीलता को दर्शाता अशोक चक्र 200 ईसा पूर्व महान शासक अशोक द्वारा बनवाए गए स्तंभों में से एक सारनाथ के स्तंभ से लिया गया है। 24 तीलियों का सामंजस्य जो अशोक चक्र में है वो दिन के 24 घण्टो का आधार है इसके चलते रहने का अर्थ है जीवन। जो दर्शाता है कि देश की प्रगति में ही हमारा जीवन है तथा चक्र का रुकना अर्थात मृत्यु।

22 जुलाई 1947 भारत की आजादी से 24 दिन पूर्व भारतीय संविधान सभा की बैठक में राष्ट्रीय ध्वज अपनाया गया था। तत्प्श्चात आज तक इसमें कोई भी बदलाव नही किया गया है इसके रंगों तथा चक्र का क्रम व अर्थ ज्यों का त्यों बना हुआ है। आइए अब जानते हैं स्वतन्त्रता सेनानियों के दिलों में जोश भर देने वाले तिरंगे के गीत का इतिहास।

Jhanda Geet in Hindi:

1931 तक भारतीय ध्वज ने तिरंगे का रूप ले लिया था तथा काँग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में इसे फहराया जाने लगा तथा तिरंगा हाथों में लेकर मार्च निकाले जाने लगे ताकि यह आम जनों में जाना जा सके। परन्तु तिरंगे शब्द को असली पहचान "झण्डा" गीत के कारण मिली। यह गीत था "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा"। उस समय लेखन में माहिर श्याम लाल गुप्त "पार्षद" ने दो रात लगातार जागकर इस अमर गीत की रचना की थी। पार्षद जी की कलम से निकला यह गीत बच्चे बच्चे की जुबान पर चढ़ गया तथा 80 वर्ष पूर्व रचित यह गीत आज भी हर भारतीय के दिल में बसता है। झण्डा गीत 19 फरवरी 1938 को रिलीज किया गया था जिसने आज़ादी की जंग लड़ रहे क्रांतिकारियों के मन में नया जोश भर दिया व देशभक्ति की भावना को चरम पर पहुँचा दिया। उस समय लिखे गए इस गीत में 7 पद्य हैं जिनमें उचित बदलाव करने के बाद इस गीत को झण्डा गीत के रूप में मान्यता दी गई। आज़ादी की लड़ाई में हथियार की तरह प्रयोग किए गए इस गीत को वर्ष 1938 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा किए गए ध्वजारोहण के समय 5 हज़ार लोगों ने एक साथ गाया था। आज़ादी के पश्चात यह गीत 15 अगस्त 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर गाया गया। गीत के रचयिता श्याम लाल गुप्त "पार्षद" को आज़ादी के बाद वर्ष 1973 में पद्यम श्री से सम्मानित किया गया। झण्डा गीत की पंक्तियाँ जो कि इस प्रकार हैं:

"विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झण्डा ऊँचा रहे हमारा
सदा शक्ति बरसाने वाला
प्रेम सुधा सरसाने वाला
वीरों को हर्षाने वाला
मातृभूमि का तन मन सारा
झण्डा ऊँचा रहे हमारा

स्वतंत्रता के भीषण रण में
लखकर जोश बढ़े क्षण क्षण में
काँपे शत्रु देखकर मन में
मिट जावे भय संकट सारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा

आओ प्यारे वीरों आओ
देश धर्म पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा
झण्डा ऊँचा रहे हमारा

शान न इसकी जाने पाये
चाहे जान भले ही जाये
सत्य की विजयी कर दिखलाएं
तब होए प्रण पूर्ण हमारा
झण्डा ऊँचा रहे हमारा"

Dimensions of Tiranga in Hindi:

तिरंगे का अनुपात, रंग की गहराई तथा पट्टियों की लम्बाई चौड़ाई सब निश्चित की गई है। इसका उद्देश्य सम्पूर्ण देश में ध्वज को एक निश्चित पहचान देना है ध्वज को निश्चित अनुपात से बड़ा या छोटा बनाना, रंगों की गहराई या फीकेपन में मनचाहे परिवर्तन करना ध्वज का अपमान समझा जाता है इसलिए यदि कोई नागरिक ध्वज फहरा रहा है तो ध्वज के सम्मान में उसके द्वारा पूरा दायित्व निभाया जाना चाहिए। अनजाने में कोई गलती न हो इस कारण अनुपात व रंग निश्चित किए गए हैं। तिरंगे का अनुपात लम्बाई चौड़ाई क्रमश: 3:2 होती है अर्थात तिरंगे की लम्बाई तिरंगे की चौड़ाई से डेढ़ गुना होनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर यदि तिरंगे की चौड़ाई 100 एम.एम. है तो लम्बाई 150 एम.एम. होनी चाहिए। इसी प्रकार रंग का एक खास कोड है जिसे आमतौर पर देख कर समझा जा सकता है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इस कोड की एक विशेष गणना है। अशोक चक्र के आयामों (डायमेंशन) के बारे में कोई प्रावधान नही है किन्तु यह गहरे नीले रंग का होना चाहिए तथा इसमें बनी तीलियों की सँख्या 24 होनी चाहिए। अशोक चक्र ध्वज के बीचों-बीच सुशोभित हो तथा सफेद पट्टी से बाहर नही होना चाहिए। तिरंगे के आदेश व दिशा निर्देश कड़े हैं तथा इनकी उपेक्षा करना एक गंभीर अपराध माना जाता है जिसके लिए जेल तथा जुर्माना दोनों तरह की सजा का प्रावधान है परन्तु इसका ये अर्थ कदापि नही है कि आप स्वतन्त्रता पूर्वक ध्वज नही फहरा सकते। ध्वज के सम्मान का ध्यान रखते हुए प्रत्येक व्यक्ति स्वतन्त्र रूप से तिरंगा फहरा सकता है। पहले देश के नागरिक 365 दिन तिरंगा नही फहरा सकते थे लेकिन वर्ष 2002 से यह आज़ादी सभी नागरिकों को मिल चुकी है 2002 में ऐसा क्या हुआ था जिस कारण भारतीय सरकार ने तिरंगे को 365 दिन फहराए जाने की आज़ादी दी। इस बारे में आगे बताएंगे लेकिन इससे पूर्व देखते हैं तिरंगे का 1857 से 2002 तक के संशोधनों का पूरा बयौरा एक नजर में।

भारतीय ध्वज के विकास की कहानी 1857 से शुरू होनी तय हुई थी क्योंकि अंग्रेजों से निपटने के लिए लोगों को एकत्रित होना था एकता के सूत्र में बंधने के लिए पूरे भारत के लिए एक राष्ट्रीय ध्वज की आवश्यकता महसूस हुई। इससे पहले कि इसके लिए कार्य किए जा सकते युद्ध समय से पहले ही शुरू हो गया तथा अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की वजह से भारत की एकता बनने से पहले ही भंग हो गई तथा ध्वज को बनाने की योजना 47 साल आगे चली गई तथा वर्ष 1904 में पहले भारतीय ध्वज का जन्म हुआ।

1904: वर्ष 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता जिनका वास्तविक नाम "मार्गरट एलिजाबेथ नोबुल" था द्वारा बनाया गया था वे एक अंग्रेज आइरिश सामाजिक कार्यकर्ता थी ने सबसे पहले झण्डे का चित्र बनाया था। इसके पश्चात वर्ष 1906 में सनिन्द्र प्रकाश बोस ने एक ध्वज का निर्माण किया इस ध्वज में तीन पट्टियां बनी हुई थी सबसे ऊपर लाल, बीच मे पीली तथा सबसे नीचे हरी। लाल पट्टी में आठ अर्ध खिले कमल के फूल सफेद रंग में छपे थे तथा हरे रंग की पट्टी में दायीं ओर चाँद व बायीं ओर सूरज का निशान सफेद रंग में अंकित था व पीली पट्टी में देवनागरी लिपि में वन्देमातरम काले अक्षरों में लिखा गया था। प्रसाद का यह ध्वज कोलकाता ध्वज के नाम से जाना जाता है। इस ध्वज को 7 अगस्त 1907 को ग्रीश पार्क कोलकाता में फहराया गया था। निवेदिता द्वारा छापा गया ध्वज भी वन्देमातरम देवनागरी लिपी पर ही आधारित था। कोलकाता ध्वज से मिलता जुलता ध्वज भिखायजी कामा ने जर्मनी में हो रही अंतराष्ट्रीय सोशल कॉन्फ्रेंस में भी फहराया था जो कि अंतरष्ट्रीय स्तर पर फहराया गया भारत का प्रथम ध्वज था। कामा ने कॉन्फ्रेंस के दौरान भारत के नागरिकों को समान मानव अधिकार देने की बात अंतराष्ट्रीय स्तर पर उठाई जिसमें भारत पर भारतीयों की स्वयं की सत्ता के बारे में कहा गया। किन्तु भारत की आजादी व राजनीति की मुख्यधारा में चल रही कांग्रेस ने अभी तक किसी भी ध्वज को नही अपनाया था।

1921: वर्ष 1921 के अप्रैल में गाँधी जी द्वारा चलाए जा रहे साप्ताहिक मुखपत्र "यंग इंडिया" में गाँधी जी ने एक राष्ट्रीय ध्वज की जरूरत के बारे में लिखा तथा निर्देश दिया गया कि इसमें एक चलता हुआ चरखा भी प्रदर्शित किया जाए। स्वयं से उन्होंने ध्वज निर्माण की जिम्मेवारी पिंगली वेंकय्या को सौंपी। गाँधी जी चाहते थे कि काँग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में यह नया झण्डा फहराया जाए। लेकिन इस झण्डे को फहराया नही जा सका क्योंकि वेंकय्या के इस झण्डे में केवल दो रंग थे लाल व हरा जो क्रमशः हिन्दू व मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करते थे। गाँधी जी ने शेष समुदायों के लिए इसमें सफेद रंग जोड़ने को कहा तथा दो रंगों वाला झंडा ना फहराना ही उचित समझा। फलस्वरूप झण्डे ने तिरंगे का रूप लिया। क्योंकि सम्प्रदायवाद भारत की आजादी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा था इस कारण गाँधी जी ने तिरंगे को निष्पक्ष बनाने का पूर्ण प्रयास किया ताकि यह बिना किसी भेद भाव के अपनाया जा सके। इसी कारण गाँधी जी ने तिरंगे के साम्प्रदायिक महत्वों को बदलते हुए धर्म निरपेक्षता को बढ़ावा दिया व लाल रंग को बलिदान, सफेद को पवित्रता तथा हरे रंग को आशा का प्रतीक बनाया। काँग्रेस द्वारा अपनाया गया यही तिरंगा झण्डा 13 अप्रैल 1923 को जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय फहराया गया था।

23 जून 1947: आजादी से कुछ दिन पहले भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय झण्डा क्या हो इस विषय में विचार विमर्श के लिए कमेटी बनाई गई। इस कमेटी ने काँग्रेस के चरखा झण्डे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में पहचान देने के बारे में सोचा। बैठक के बाद निर्णय लिया गया कि तिरंगे को ही भारतीय झण्डा बनाया जाएगा लेकिन इसमें राजनीतिक दृष्टि से कुछ बदलाव किए जाने चाहिए। ताकि यह ध्वज सभी समुदायों व सभी रानीतिक दलों द्वारा समान रूप से स्वीकार किया जा सके। क्योंकि राजनीतिक दबाव न बनने देना उस समय अति महत्वपूर्ण हो गया था इसलिए इसी बदलाव के विचार को ध्यान में रहते हुए चरखे का निशान स्थानांतरित कर अशोक चक्र को तिरंगे में शामिल किया गया क्योंकि महात्मा गाँधी का नाम काँग्रेस से जुड़ा था। अशोक चक्र को इसलिए लिया गया क्योंकि चरखे की तरह समान भाव से प्रगति को तो दर्शाता था लेकिन राजनीतिक रूप से निष्पक्ष था। इस प्रकार 23 जून 1947 को आजादी से 23 दिन पूर्व तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया गया।

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