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जियो और जीने दो का नारा किसने दिया

मानवीय सिद्धान्तों को अपने अंदर समेटे हुए "जिओ और जीने दो" का नारा जनमानस में प्राचीन काल से ही लोकप्रिय रहा है। यह नारा जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की मानवीय सीखों का मूल है। महावीर स्वामी द्वारा दिए गए इस नारे में छिपी सीख का अनुसरण आज भी सभी धर्मों के लोगों द्वारा बिना किसी भेदभाव के किया जाता है। जैन सभाओं तथा धार्मिक क्रियाओं में यह नारा अक्सर गूँजता हुआ सुना जाता है। अपने जीवनकाल में महावीर स्वामी ने मानवीय मूल्यों और जीवन की रक्षा हेतु लोगों को इस नारे से प्रेरित किया था। मानवीय जीवन को श्रेष्ठ बनाने, स्वयं जीने व दूसरों को जीने देने की सीख देता "जिओ और जीने दो" का नारा रूपी यह नियम प्राचीन काल से ही आम जनों में दोहराया जाता रहा है।

महावीर स्वामी शिक्षा देते हुए कहते हैं कि
"मनुष्य जीवन इस सम्पूर्ण धरती पर सर्वोपरि है तथा यह उसे ही मिलता है जिसके अच्छे कर्मों से ईश्वर खुश होते हैं। इस शरीर का प्रयोग निर्बल जीवों की रक्षा करने हेतु किया जाना चाहिए। सभी मनुष्यों व जीवों को जीने का समानाधिकार है ईश्वर द्वारा दिए गए इस जीवन को किस तरह व्यतीत करना है यह सबका निजी अधिकार है। हमें उन्हें दुःख पहुँचाकर इस अधिकार का हनन नही करना है विपरीत इसके हमें स्वयं के जीवन पर ध्यान केंद्रित करना है। अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने हेतु प्रयत्नशील होना है। स्वयं जीना है और अन्य जीवों को स्वतंत्र रूप से जीने देना है। किसी से कोई ईर्ष्या द्वेष न रखकर आत्म केंद्रित होना है। जब सभी मनुष्य ऐसा कर सकने में समर्थ हो जाएंगे तो सम्पूर्ण संसार मे शांति होगी व सब जीव धरती पर ही स्वर्ग का अनुभव करने लगेंगे"
यह शिक्षा देते हुए महावीर स्वामी ने जिओ और जीने दो का नारा देते हैं।

ऐसा नही है कि यह नारा मात्र हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही प्रचलित है बल्कि अंग्रेजी भाषा में भी यह लोकप्रियता के उच्च स्तर पर है। अंग्रेजी में इसे "लाइव एंड लेट लाइव" कहा जाता है। माना जाता है कि अंग्रेजों के भारत मे बसने के बाद उन्ही के जरिए यह नारा अन्य देशों में पहुँचा है। आधुनिक समय में यह नारा अनेकों गणमान्य व्यक्तियों द्वारा बार-बार दोहराए जाने व जनमानसों द्वारा अपने जीवन में सींचे जाने के कारण लोकप्रिय हुआ है। द्वितीय विश्व युद्ध में शांति की अपील करते हुए इस नारे को दोहराया गया था। 1982 में शीर्षक "जिओ और जीने दो" से एक फ़िल्म प्रदर्शित कर इस नारे के सदेंश को फिल्मी पर्दे पर भी उतारा जा चुका है।
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