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तुगलकी फरमान क्या है

हम बहुत बार समाचारों में सुनते हैं या अखबारों लिखा हुआ देखते हैं कि कुछ नेता सरकार के कुछ फैसलों को तुगलकी फरमान कह कर कटाक्ष करते हैं या फिर किसी भी पार्टी के विरुद्ध कहा जाता है कि कोई पार्टी विशेष तुगलकी फरमान जारी कर रही है। लेकिन जिन्हें इसका अर्थ नही पता वे इस शब्द को सुनकर यह नही समझ पाते कि आखिर सामने वाले के कहने का क्या भाव है और आखिर ये तुगलकी फरमान होता क्या है। और इसे तुगलकी फरमान ही क्यों कहा जाता है और यह कैसे एक सामान्य फरमान से अलग होता है। 

तुगलकी फरमान का अर्थ समझने से पहले हमें ये समझना होगा कि फरमान क्या होता है। फरमान वह शब्द है जो किसी सरकार द्वारा जनता तथा किसी राजा द्वारा शासक पर लागू किए गए फैसले के लिए प्रयोग किया जाता है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि एक तुगलकी फरमान सामान्य फरमान से अलग कैसे होता है और इसका नाम तुगलकी फरमान ही क्यों पड़ा। इस बारे में पूर्ण जानकारी के लिए इस पोस्ट को अंत तक पढ़े।

तुगलकी फरमान में तुगलकी शब्द चौदहवीं शताब्दी में दिल्ली की सत्ता पर काबिज रहे तुगलक राजाओं से जुड़ा हुआ है। तुगलक राजाओं में सबसे एक राजा मोहम्मद बिन तुगलक को उसके बेवकूफी भरे फैसलों के लिए जाना जाता है। कुछ इतिहासकार इसे समय से आगे चलकर देखने वाला दूरदर्शी विद्वान मानते हैं जबकि कुछ इतिहासकारों की नज़र में मोहम्मद बिन तुगलक एक निहायती बेवकूफ राजा था। इतिहासकारों के द्वारा दिए गए इन नामों का कारण है मोहम्मद बिन तुगलक द्वारा बिना सोचे समझे जारी किए गए कुछ फरमान जो उसने अपनी जनता पर सख्ती से लागू किए। मोहम्मद बिन तुगलक बिना किसी सोच विचार के व बिना अपने मंत्रियों की सलाह लिए कई बार ऐसे फैसले ले लेता था जिससे की पूरी की पूरी जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था और समय के साथ उसके इन फैसलों से त्रस्त जनता ने राजा को निरा मूर्ख कहना शुरू कर दिया। और जब भी जनता को भविष्य में किसी राजा ने इस प्रकार का कोई सख्त आदेश दिया तब जनता ने सख्त फरमानों को तुगलकी फरमान कहना शुरू कर दिया। लेकिन मोहम्मद बिन तुगलक द्वारा जारी किए गए ये फरमान आखिर थे क्या आइए जानते हैं।

चौहदवीं सदी में दिल्ली के शासक रहे मोहम्मद बिन तुगलक का पहला फैसला था अपनी राजधानी दिल्ली से महाराष्ट्र के देवगिरी में स्थानांतरित करना। हालांकि सब राजा समय-समय पर अपनी राजधानी को स्थानांतरित करते आए हैं लेकिन मोहम्मद बिन तुगलक के राजधानी स्थानांतरण के इस फैसले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि उसने दिल्ली की जनता को भी देवनागरी स्थानांतरित होने के लिए मजबूर किया अर्थात वह राजधानी को लोगों सहित उठाना चाहता था। अब राजा का फैसला था तो जनता को भी मानना पड़ा और वह मन में द्वेष दबाए देवगिरी स्थानांतरित हो गई। लेकिन देवगिरी में पानी की किल्लत के चलते जनता ने बहुत परेशानियों का सामना किया और प्यासी मरने लगी। अब राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ और पुनः अपनी राजधानी दिल्ली ले आया और जनता गालियाँ देती हुई पुनः दिल्ली में आकर बस गई इस हजारों किलोमीटर की दुख भरी यात्रा में बहुत से लोगों को अपनी जान तक गवानी पड़ी थी। राजा के लिए गए इस नासमझी के फैसले से जनता के मन में द्वेष की भावना थी और उसकी स्थिति ऐसी थी जो इसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस राजा की बेवकूफियों पर हंसे या रोए क्योंकि ऐसा बेवकूफी भरा फैसला उन्होंने अपनी जिंदगी में पहली बार सुना था।

मोहम्मद बिन तुगलक का दूसरा फैसला था ताँबे के सिक्के जारी करना। राजा ने देखा कि सोना और चांदी दुर्लभ है इसकी सोने और चांदी की महंगाई व दुर्लभता को देखते हुए मोहम्मद बिन तुगलक ने कड़ा फैसला लिया कि साम्राज्य में जितने भी सोने चांदी के सिक्के हैं उन्हें तांबे के सिक्के बदल दिया जाए इसका विपरीत असर यह हुआ कि तांबा बहुत ही आसानी से आसानी से प्राप्त किया जा सकता था इसलिए लोगों ने घरों में ही सिक्के छापना शुरु कर दिया। सिक्कों की भारी नकल के चलते साम्राज्य की मुद्रा का मूल्य गिरने लगा और मुद्रा तांबे के टुकड़े में तब्दील होने लगी। फलस्वरूप मोहम्मद बिन तुगलक ने फैसला वापिस ले लिया और सोने व चांदी के सिक्कों को पुनः लागू किया कारणवश राजा को नकली तांबे के सिक्कों के बदले भी असली सोने चाँदी के सिक्के देने पड़े जिससे राजस्व को बहुत अधिक हानि का सामना करना पड़ा। इस प्रकार तुगलक का यह निर्णय भी एक बेवकूफी भरा फैसला साबित हुआ।

मोहम्मद बिन तुगलक के इन दो फैसलों के कारण बिना सोचे-समझे व बिना प्रजा के हितों का ध्यान रखे सख्ती से लागू किए जाने वाले फैसलों को तुगलकी फरमान कहा जाने लगा। इसलिए आज भी जब कोई ऐसा फैसला आता है जिसमें विचार-विमर्श व तर्क वितर्क ना किया गया हो और किसी एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को तरजीह दी गई हो तो ऐसे फैसलों को तुगलकी फरमान कहा जाता है लोकतंत्र में इस शब्द को कटाक्ष को तरह देखा जाता है।
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