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स्यादवाद का अर्थ क्या है?

भारतीय दर्शन का विस्तार व्यापक है। भारत में पनपे अलग-अलग धर्मों के दर्शनों से मिलकर भारतीय दर्शन वृहद रूप धारण कर लेता है। धर्मानुसार भारतीय दर्शन में अनेक सिद्धांत दिए गए हैं जो आज के सापेक्ष में भी उतने ही अनुकूल है जितने वे हजारों वर्ष पूर्व में थे। इसी प्रकार का एक सिद्धांत है स्यादवाद। स्यादवाद सिद्धांत का संबंध जैन दर्शन से है आइए जानते हैं यह सिद्धांत क्या कहता है।

स्यादवाद सिद्धांत स्यात शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है शायद। यह कहता है कि साधारण व्यक्ति के लिए पूर्णता को प्राप्त कर पाना सरल नहीं है इसलिए प्रत्येक साधारण व्यक्ति पूर्ण सत्य से नही बल्कि केवल सत्य के आंशिक रूप (जिसे नय कहा जाता है) से ही अवगत हो पाता है। पूर्ण सत्य की प्राप्ति के लिए एक वस्तु या विचार के विभिन्न दृष्टिकोणों को समझना अनिवार्य होता है।

इस सिद्धांत को समझाने के उद्देश्य से जैन दर्शन में एक कहानी का जिक्र किया गया है। इस कहानी को अलग-अलग दार्शनिकों द्वारा अपने तरीके से समझाया गया है। यह कहानी 6 अंधों की है जो अकस्मात ही एक हाथी के सामने पड़ जाते हैं और वह उसे छूकर पता लगाने की कोशिश करते हैं कि जो वस्तु उनके सामने आई है वह क्या है। एक अंधा हाथी के पांव को छूकर कहता है कि यह एक खंबा है, दूसरा अंधा उसकी सूंड को छूकर कहता है कि यह एक अजगर है, तीसरा अंधा हाथी की पूंछ को छूते हुए कहते हैं कि या तो एक रस्सी है चौथा अंधा हाथी के पेट को छूकर कहता है कि यह तो एक दीवार है, पांचवा अंधा हाथी के कान को छूकर कहता है कि यह तो एक हाथ का बड़ा पंखा है। इस प्रकार सभी अंधे अपने अनुभव के अनुसार एक परिभाषा का निर्माण करते हैं और उसे ही मूल सत्य मानने लगते हैं। लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि उनका सत्य वास्तविक सत्य से कितनी दूर है।

इसी तरह से मनुष्य होते हैं सभी मनुष्य इसी तरह पूर्ण सत्य से अवगत नहीं होते बल्कि वे केवल सत्य के एक आंशिक रूप से ही अवगत होते हैं। जिस प्रकार अंधों ने हाथी के एक अंग के आधार पर उसे पूरी तरह से अलग जीव या वस्तु मान लिया ठीक ऐसे ही साधारण व्यक्ति किसी सत्य के आंशिक रूप को ही पूर्ण सत्य मानकर बैठ जाते हैं और कुछ लोग अपने सत्य को लेकर इतने आश्वस्त होते हैं कि सामने वाले के अनुभव को जाने बगैर ही उसके विचारों को नकार देते हैं। ये सोचे बगैर कि सामने वाले ने जो अनुभव किया है उसे ही सत्य माना है और सत्य-असत्य का यही खेल व्यक्तियों के बीच मतभेद का कारण बनता है और इसी के चलते मनुष्य के समूहों के बीच संघर्ष होते रहते हैं। अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानने का भाव भी पूर्ण सत्य से अवगत न होने को लेकर ही आता है। इसीलिए कुछ लोग अपने धर्म को लेकर कट्टर हो जाते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि जो उनके धर्म ने कहा है वोही अंतिम सत्य है।

इसीलिए जब भी व्यक्ति किसी बात से अवगत हो उसे यह संदेह रखना चाहिए कि इस बात में त्रुटि हो सकती है। यही कारण है कि जब भी कहीं कोई बात कही जाए तो मेरे ख्याल से, जहां तक मैं जानता हूँ, मुझे लगता है जैसे वाक्यों का प्रयोग किया जाना चाहिए। ऐसे में सामने वाला व्यक्ति आपको कभी भी गलत नही समझेगा क्योंकि उसे लगेगा कि आपने केवल अपनी समझ के आधार पर कुछ कहा है ना कि उसकी जानकारी को सिरे से नकारा है। यही स्यादवाद सिखाता है कि कोई भी व्यक्ति पूर्णतः सही नही होता वह हमेशा सत्य के एक अंश से ही अवगत हो सकता है ना कि पूर्ण सत्य से। इसलिए उसे दूसरों के विचारों को भी उतनी ही अहमियत देनी चाहिए फिर चाहे वे विचार उसकी समझ के अनुसार सही हों या ना हों।

स्यादवाद क्या है : जैन दर्शन से जुड़ा सिद्धांत

स्यादवाद की परिभाषा : कोई भी व्यक्ति पूर्ण सत्य से अवगत नही होता इसलिए प्रत्येक सत्य में शायद या संदेह की भावना होती है, यही संदेहपूर्वक सत्य का सिद्धांत स्यादवाद कहलाता है।

स्यादवाद शब्द का मूल : यह शब्द "स्यात" से बना है जिसका अर्थ होता है "शायद"

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