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भूल जाने का अधिकार क्या है?

आज का समय इंटरनेट का समय है आज यदि किसी भी व्यक्ति के बारे में कोई जानकारी प्राप्त करनी हो तो सबसे पहले गूगल सर्च का ही इस्तेमाल किया जाता है। गूगल पर आने वाली जानकारी चाहे विश्वसनीय हो या ना हो लेकिन यह फर्स्ट इम्प्रैशन जरूर पैदा करती है जिसका प्रभाव व्यक्ति, कंपनी या संस्था की सामाजिक छवि पर पड़ता है। इस प्रकार यदि किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में गूगल पर सर्च किया जाता है जिस पर इतिहास में कोई आपराधिक मामला चला हो तो उस मामले से जुड़ी जानकारी व कोर्ट के फैसले से जुड़े दस्तावेज जो इंटरनेट पर प्रकाशित किए गए थे वे सबसे पहले पेज पर दिखाए जाने लगते हैं। ऐसे में उस व्यक्ति को बरी हो जाने के बाद भीे पूरी उम्र उस केस के साए में जीना पड़ता है क्योंकि जब भी कोई उसका नाम इंटरनेट पर सर्च करता है तो उसकी पुरानी जजमेंट सामने आती है। जिससे पता चल जाता है कि इस व्यक्ति पर कोई केस हुआ था। यानी कि एक समय वह व्यक्ति अपराधी माना गया था ऐसे में उसकी सामाजिक छवि ताउम्र धूमिल होती रहती है।

अब जब कोर्ट ने उस व्यक्ति को निर्दोष मानकर बरी कर दिया है तो वह समाज की नजर में भी निर्दोष होना चाहिए। इसलिए यह बिल्कुल भी जायज नही ठहराया जा सकता कि इंटरनेट के माध्यम से उसे मानसिक सजा मिलती रहे। तो ऐसे में जितनी भी इंफॉर्मेशन उसके केस के बारे में गूगल (इंटरनेट) पर है उसे हटाया जाना चाहिए हटाए जाने की इसी प्रक्रिया को इंटरनेट द्वारा भूल जाना कहा जाता है। इसीलिए जानकारी इंटरनेट से हटाए जाने का अधिकार, भूल जाने का अधिकार कहलाता है। इसे इंग्लिश में राइट टू बी फॉरगोटन कहा जाता है।

भारत में स्थिति : फिलहाल कानूनी रूप से यह अधिकार भारत में नहीं दिया गया है लेकिन निजता के अधिकार के तहत कुछ याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत जानकारी को इंटरनेट से अवश्य हटाया गया है। लेकिन यह जानकारी हटाते हुए ध्यान रखा जाता है कि राइट टू इंफॉर्मेशन और जो भी जजमेंट दी गई है उसकी ट्रांसपेरेंसी बनी रहे। अभी तक इस विषय में मद्रास हाई कोर्ट, केरला हाई कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट इत्यादि अपने फैसले सुना चुके हैं जिसमें बहुत से याचिकाकर्ताओं की जानकारी को गूगल और इंडियन कानून जैसी वेबसाइटों से हटाने को लेकर निर्देश दिए जा चुके हैं।

भूल जाने का अधिकर क्या है : इंटरनेट से व्यक्तिगत व आपराधिक फैसलों की कॉपी हटाने का अधिकार

भारत में स्थिति : कानून नही है लेकिन निजता के अधिकार के तहत प्रयोग किया जा सकता है।

फैसले : दिल्ली, केरल व मद्रास हाईकोर्ट द्वारा निर्देश देकर कुछ याचिकाकर्ताओं की जानकारी को इंटरनेट से हटवाया गया है।

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