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कहां राजा भोज कहां गंगू तेली कहावत का क्या अर्थ है

यह एक प्रसिद्ध कहावत है जो सैंकड़ो वर्षों से चली आ रही है इसकी शुरुआत 1000 ईसवी के समय में हुई थी उस समय राजा भोज जिनका पूरा नाम धार नरेश भोजदेव पंवार था का शासन चल रहा था। भोजदेव परमार वंश के नौवें राजा थे। राजा भोज का समयकाल 1000 से 1055 ईसवी तक चला। 55 वर्ष के इस सफल शासनकाल में भोजदेव जनता के दिलों में बस चुके थे उनके राज में प्रजा ने सुख के दिन व्यतीत किए। राजा भोज जिस क्षेत्र के राजा थे उसे वर्तमान में मध्य प्रदेश राज्य के नाम से जाना जाता है। मध्य प्रदेश का धार जिला उस समय राजा भोज के राज्य की राजधानी हुआ करता था तथा इसका नाम धारा नगरी था।

राजा भोज जनता के प्रिय थे तथा एक सज्जन पुरुष के तौर पर जाने जाते थे व बसंत पंचमी के दिन प्रजा के लिए विशाल प्रतिभोज का आयोजन किया करते थे यह प्रतिभोज 40 दिनों तक निरंतर चला करता था। राजा व प्रजा दोनों सुख से जीवन व्यतीत कर रहे थे कि अचानक दक्षिण से धारा नगरी पर आक्रमण हुआ। यह आक्रमण दक्षिण के दो राजाओं ने मिलकर किया था इनमें से एक कलचुरी नरेश "गांगेय" तथा दूसरा चालुका नरेश "तैलेंग" था। कनार्टक क्षेत्र के ये दोनों राजा मिलकर धारानगरी पर अपना नियंत्रण करना चाहते थे। परंतु प्रतिउत्तर में राजा भोज जब सेना की मामूली सी टुकड़ी लेकर इनसे लड़ने पहुँचे तो इन दोनों राजाओं को मुँह की खानी पड़ी और रण क्षेत्र से भाग खड़े हुए। इस प्रकार राजा भोज कर्मं और शक्ति दोनों में श्रेष्ठ तथा "गांगेय तैलेंग" क्षीण साबित हुए। राज्य की प्रजा में जब यह बात फैली तो उन्होंने इन दोनों राजाओं का मजाक उड़ाते हुए कहावत कही "कहां राजा भोज कहां गांगेय तैलेंग" वक्त के साथ-साथ यह कहावत बढ़ती गई और धीरे-धीरे गांगेय तैलेंग का स्थान गंगू तेली शब्द ने ले लिया। इस कहावत का यह अशुद्ध रूप आज़ तक अस्तित्व में है। इस कहावत का प्रयोग कर श्रेष्ठ व क्षीण की तुलना की जाती है। तंज कसती यह कहावत देश में इतनी लोकप्रिय है कि हिन्दी फिल्मों में इस पर गीत रचे जा चुके हैं।
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