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संविधान संशोधन लिस्ट को विस्तार से लिखिए

भारत का संविधान एक संजीव दस्तावेज माना जाता है क्योंकि इसमें संशोधन किया जा सकता है। आज तक भारत के संविधान में 100 से भी ज्यादा बार संशोधन किए जा चुके हैं। उन सभी संविधान संशोधन की लिस्ट हम इस आर्टिकल में जानेंगे और समझने का प्रयास करेंगे कि कौन सा संविधान संशोधन कब हुआ और किस प्रकार के प्रावधान उसमें किए गए। पहला संविधान संशोधन वर्ष 1951 में किया गया था और इसके माध्यम से स्वतंत्रता, समानता और संपत्ति से संबंधित मौलिक अधिकारों को लागू किए जाने को लेकर जो अड़चनें आ रही थी उनको दूर करने का प्रयास किया गया था साथ ही संशोधन के द्वारा संविधान में नौवीं अनुसूची को जोड़ा गया था जिसके विषय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर थे। दूसरा संविधान संशोधन वर्ष 1952 में किया गया था तथा इसके अंतर्गत जनगणना के आधार पर लोकसभा में प्रतिनिधित्व को पुनः व्यवस्थित किया गया था। तीसरा संविधान संशोधन वर्ष 1954 में किया गया था इसके अंतर्गत सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में खाद्यान, पशुओं का चारा, कपास और जूट आदि से संबंधित प्रावधान किए गए थे तथा इन्हें सरकार के नियंत्रण में लाया गया था। चौथा संविधान संशोधन

ऋग्वेद की रचना कब हुई

प्रत्येक धर्म का दर्शन किसी ना किसी आधार पर टिका होता है इसी प्रकार हिंदू धर्म का दर्शन जिस आधार पर टिका है उसे वेद कहा जाता है भारत में मुख्य रूप से नौ दर्शन हुए हैं जिसमें से छह दर्शन ऐसे हैं जो मूल रुप से वेदों को मानते हैं और किसी ना किसी प्रकार से उन पर आधारित है लेकिन वेदों में भी एक सबसे महत्वपूर्ण वेद है जिसे ऋग्वेद कहा जाता है तथा जिसे सनातन धर्म का सबसे आरंभिक स्रोत माना जाता है उसी के बारे में इस आर्टिकल में हम बात करेंगे जानेंगे कि वेद कब लिखा गया था और साथ में इसके बारे में कुछ अन्य महत्वपूर्ण जानकारी जो परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. वैदिक संस्कृत भाषा में लिखा गया ऋग्वेद चारों वेदों में से सर्वप्रथम है इसकी परिभाषा के अनुसार रिचाओं का क्रमबद्ध संग्रह ऋग्वेद कहलाता है मंडलों की बात की जाए तो और ऋग्वेद में मूल रूप से 10 मंडल है और 1028 सूक्त हैं और यह सब मिलकर 10,462 रिचाओं का निर्माण करते हैं वैदिक संस्कृत में लिखित ऋग्वेद को लिखे जाने का समय 1500 से 1000 ईसा पूर्व तक माना जाता है हालांकि ज्यादातर वेदों में विश्वास रखने वाले दर्शन इसे अपौरुष मानते हैं यानी कि वे मा

भारत की पर्वत श्रेणियां जो भारत को दो भागों में बांटती है

भारत में अनेक पर्वत श्रृंखलाएं हैं जिनमें से यदि हम मुख्य रूप से नाम लें तो जम्मू कश्मीर में काराकोरम पर्वत श्रृंखला, वहीं दिल्ली के पास अरावली पर्वत श्रृंखला स्थित है। वहीं यदि दक्षिण भारत की बात की जाए तो पूर्वी तट यानी कोरोमंडल तट पर हमें पूर्वी घाट दिखाई देते हैं तो वही मालाबार तट पर हमें पश्चिमी घाट दिखाई देते हैं। पूर्वी घाट की बनावट लगातार एक लय में नहीं है ये बीच से कटे हुए हैं क्योंकि उनके बीच से कृष्णा और गोदावरी जैसी नदियां बहती हैं तो वहीं पश्चिमी घाट की श्रृंखला एक सार चलती है। इस प्रकार भारत में अनेक पर्वत श्रृंखलाएं स्थित हैं जिनका अपना महत्व है लेकिन मूल रूप से हम जिस पर्वत श्रृंखला की बात कर रहे हैं वह भारत के मध्य में स्थित है और भारत को दो भागों उत्तरी भारत और दक्षिण भारत में बांटती है। उत्तर और दक्षिण भारत के बीच में वैसे तो कई पर्वत श्रृंखलाएं मौजूद हैं जिनमें सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला, मैकाल पर्वत श्रृंखला और कैमूर पर्वत श्रृंखला शामिल है लेकिन यहां स्थित विंध्य पर्वत श्रंखला मूल रूप से भारत को दो भागों में विभाजित करती है उत्तर भारत को दक्षिण भारत। विंध्या पर्वत श्र

भारतीय इतिहास का काल विभाजन किसने किया?

इतिहास अध्ययन करने के लिए समय-समय पर अनेक प्रकार के प्रयोग किए गए हैं। इसमें जो सबसे बेहतरीन प्रयोग कर रहा है वह इतिहास को अलग-अलग कालखंडों में बांट कर समझना। इतिहास को अलग-अलग विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से बांटा है। आज के समय में अध्ययन की दृष्टि से प्रचलित रूप में इतिहास को मुख्य रूप से तीन खंडों में बांटा जाता है। चाहे वह भारत का इतिहास हो या दुनिया का, मुख्य रूप से हम इसे तीन भागों में बांटकर पढ़ते हैं। सबसे पहला भाग है प्राचीन, दूसरा मध्यकालीन और तीसरा आधुनिक। भारत के सापेक्ष में बात की जाए तो भारत का प्राचीन इतिहास प्राचीनतम काल से लेकर 700 ईस्वी तक का रहा है, उसके बाद मध्यकालीन इतिहास 700 से लेकर 1707 ईस्वी तक का रहा है और उसके बाद का जो इतिहास है उसे आधुनिक इतिहास के नाम से जाना जाता है जिसमें अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन के बारे में सर्वाधिक बात की जाती है। इतिहास को तीन भागों में बांटने का श्रेय मुख्य रूप से जर्मन इतिहासकार क्रिस्टोफ सेलियरस को जाता है। जिसका जन्म 1638 में हुआ था और 1707 यानी कि वही वर्ष जिस वर्ष भारत का मध्यकालीन इतिहास समाप्त होता है, उस वक्त सेलियरस की

भारत के 7 नाम कैसे पड़े

भारत यानी कि पृथ्वी का वह भूभाग जो हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैला हुआ है और मूलतः एक उपमहाद्वीप के रूप में स्थित है, को अनेक प्राचीन ग्रंथों में भारतवर्ष के नाम से जाना गया है। यदि हम महाकाव्य और पुराणों की बात करें तो वहां पर भारत को भारतवर्ष कहा गया है। जिसका मूल रूप से अर्थ होता है भरतों का देश। प्राचीन ग्रंथों में यहां के निवासियों को भारती यानी कि भरत की संतान कहा गया है। मूल रूप से देखा जाए तो प्राचीन समय में भरत नाम का एक कबीला हुआ करता था। इसके निवासी ही आगे चलकर भारत के मूल निवासी कहलाए। अब क्योंकि इस कबीले को भरत नाम से जाना जाता था इसी नाम से यह भूक्षेत्र भारतवर्ष के रूप में जाना गया। भारत के नाम से जुड़े तथ्य यहीं पर समाप्त नहीं होते क्योंकि भारत का नाम केवल भारतवर्ष ही नहीं बल्कि इस भूभाग को कुछ स्थानों पर जंबूद्वीप यानी कि जामुन के वृक्षों का द्वीप भी कहा जाता था। क्योंकि माना जाता है कि यहां पर मुख्य रूप से जामुन के वृक्ष पाए जाते थे। इसके अलावा क्योंकि भारत की जो पश्चिमी सीमा है वह सिंधु नदी को छूती है और सिंधु नदी की घाटी में ही बहुत सी विकसित सभ्यताएं सर्वप्

Zafarnama in Hindi Translation and Meaning

आज से लगभग सवा तीन सौ साल पहले वर्ष 1705 में भारत के पंजाब में चमकौर की लड़ाई हुई थी। सिखों और मुगल साम्राज्य के बीच हुई इस लड़ाई में सिखों की अगुवाई सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह कर रहे थे तो वहीं मुगल फौज की अगुवाई सरहिंद का गवर्नर वजीर खान कर रहा था। उस समय मुगल सल्तनत औरंगजेब के अधीन थी जिसने खुद अपने भाई और पिता से विद्रोह करके इस सल्तनत को हासिल किया था। औरंगजेब ने गुरु गोविंद सिंह को चमकौर के गड़ी खाली करने के लिए कुरान की कसम खाकर यह वायदा किया था कि यदि वे शांति से चमकौर की गड़ी को खाली कर देते हैं तो उन्हें कुछ नहीं कहा जाएगा व बा-इज्जत जाने दिया जाएगा। लेकिन कुरान की कसम पर औरंगजेब के हस्ताक्षर होने के बावजूद भी मुगलिया फौज ने पहाड़ी राजाओं के साथ मिलकर धोखे से सिख सेना पर हमला कर दिया, हालांकि इस बात के पुख्ता सबूत नही हैं कि जो हस्ताक्षर कुरान की कसम पर किए गए थे वे औरंगजेब के वास्तविक हस्ताक्षर थे। इसलिए जफरनामा में एक असमंजस भी दिखाई पड़ता है जिस कारण गुरु गोबिंद सिंह औरंगजेब को कसम तोड़ने वाला कहने के बावजूद उसे आकर मिलने का न्यौता भी देते हैं। उस समय सिख फौज की गिन

मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है

भारत विविधताओं वाला देश है और भारत में अनेक प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं और कुछ त्यौहार ऐसे हैं जिन्हें भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार का एक त्यौहार है जिसे उत्तर भारत में मकर सक्रांति Makar Sankranti के नाम से जाना जाता है। मकर सक्रांति प्रमुख भारतीय त्यौहार है और यह भारत सहित नेपाल में भी अनेक रूपों में मनाया जाता है मकर सक्रांति एक ऐसा त्यौहार है जिसे हिंदू कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अंतर्गत आने वाले पौष माह में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है उस समय मकर संक्रांति मनाई जाती है। यदि ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार वर्तमान शताब्दी की बात की जाए तो यह त्योहार ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार जनवरी माह के 14वें या 15वें दिन पड़ता है यानी कि हर वर्ष  जनवरी की 14 या 15 तारीख को मकर सक्रांति मनाई जाती है। मकर सक्रांति को अलग-अलग क्षेत्र में भिन्न-भिन्न नाम है जैसे यदि हम दक्षिण भारत की बात करें तो दक्षिण भारत में मकर सक्रांति को पोंगल के रूप में मनाया जाता है जो कि एक दक्षिण भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसी प्रकार यदि

डच कौन थे

अंग्रेजों के भारत पर शासन करने से पहले अनेक यूरोपीय देशों के लोग भारत में आए और अपने व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति करने का प्रयास किया हालांकि अंत में अंग्रेज भारत में अच्छी तरह से स्थापित हो सके लेकिन उनसे पहले पुर्तगाली डच और यहां तक कि फ्रांसीसी भी आ चुके थे। इस आर्टिकल में हम बात करेंगे कि डच भारत में कब आए, कहां पर उन्होंने अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की और किस प्रकार से अपने व्यापार का विस्तार किया। डच मूल रूप से नीदरलैंड के लोगों को कहा जाता है और नीदरलैंड के लोग भारत में पुर्तगालियों के बाद आए थे। यानी कि सबसे पहले यूरोप के किसी देश के लोग भारत आए तो वे पुर्तगाली थे। पुर्तगाली भारत में वर्ष 1498 भारत में आए थे। वर्ष 1498 के बाद यूरोप में जितना भी व्यापार समुद्र के रास्ते भारत से होता था वह पुर्तगालियों के माध्यम से होता था और पुर्तगालियों के जहाज से भारत सहित दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों जैसे इंडोनेशिया से मसालों का व्यापार किया जाता था। हालांकि इस व्यापार में मसालों के अलावा चाय जैसे अन्य उत्पाद भी शामिल थे जो यहां से ले जाकर यूरोप में बेचे जाते थे, लेकिन पुर्तगाली यूरोप में हर

साहित्यिक स्रोत किसे कहते हैं?

भारतीय इतिहास को जानने के लिए जितने भी स्त्रोत हमें प्राप्त होते हैं हमने उन्हें दो भागों में बांट दिया है। पहला है साहित्यिक स्रोत, और दूसरा है पुरातात्विक स्त्रोत। इस आर्टिकल में हम साहित्यिक स्रोतों को समझने की कोशिश करेंगे। दरअसल वे लिखित रचनाएं जिनसे हमें भारत या विश्व के इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है उन्हें साहित्यिक स्रोत कहा जाता है। साहित्यिक स्रोतों के अंतर्गत वैदिक रचनाएं, बौद्ध और जैन साहित्य, महाकाव्य, पुराण, संगम साहित्य, प्राचीन जीवनियां, कविता और नाटक इत्यादि आते हैं। उपरोक्त में से वैदिक साहित्य संसार का सर्वाधिक प्राचीन साहित्य है। वैदिक साहित्य में सर्वाधिक महत्व वेदों का है। वेद चार है ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। यद्द्पि वेद धार्मिक साहित्य के अंतर्गत आता है किंतु इसकी ऐतिहासिक वैधता भी है। चार वेदों में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है इसमें आर्यों के जीवन की संपूर्ण जानकारी मिलती है साथ ही उनकी सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों पर भी प्रकाश डाला गया है। तो वहीं अथर्ववेद में आर्यों की सांस्कृतिक प्रगति के बारे में जानकारी मिलती है। इसलिए यदि हमें आ

कर्क रेखा किसे कहते हैं?

हमारी पृथ्वी की विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों को समझने के लिए इस पर कुछ काल्पनिक रेखाएं खींची गई हैं। मुख्य रेखाओं की बात करें तो पृथ्वी के मध्य भाग के नजदीक तीन रेखाएं खींचीं गई हैं। पहली रेखा जो सबसे मध्य में है उसे भूमध्य रेखा या विषुवत रेखा कहा जाता है। दूसरी रेखा जो साढ़े 23 डिग्री उत्तर में स्थित है उसे कर्क रेखा कहा जाता है और तीसरी रेखा जो साढ़े 23 डिग्री दक्षिण में स्थित है उसे मकर रेखा कहा जाता है। इन तीनों रेखाओं की विशेष बात यह है कि इन्हीं तीनों रेखाओं के आसपास की दुनिया के लगभग सभी बड़े मरुस्थल स्थित है। इसका कारण यह है कि इन तीनों रेखाओं पर सूर्य वर्ष के अलग-अलग हिस्सों में लंबवत रहता है जिसकी वजह से सूर्य की।किरणें ज्यादातर समय इन्हीं रेखाओं से जुड़े हुए स्थानों पर पड़ती है। कर्क रेखा भारत के 8 राज्यों से होकर गुजरती है ये राज्य हैं गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम। जब सूर्य उत्तरायण में होता है तो यह कर्क रेखा पर सीधी किरणें डालता है जिसके चलते पृथ्वी के उत्तरी भाग (कर्क रेखा के क्षेत्रों) में भीषण गर्मी पड़ती है। जबकि उस