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धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता क्या है Dharmnirpekshta Aur Panthnirpekshta Kya Hai

Dharmnirpekshta Kya Hai? धर्म निरपेक्षता के मायने क्या हैं, क्या भारत एक Dharmnirpeksh देश है, धर्मनिरपेक्षता की शुरुआत कब हुई, धर्मनिरपेक्षता का क्या महत्व है, Secular कौन होता है, क्या भारत की शासन व्यवस्था धर्म निरपेक्षता का पालन करती है? पंथनिरपेक्षता क्या है? यदि आप इन्ही सब प्रश्नों के उत्तर खोज रहे हैं तो यह पृष्ठ आपके लिए ही है। इस पृष्ठ पर आपको धर्मनिरपेक्षता से जुड़े आपके सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे।

दोस्तों धर्मनिरपेक्षता जिसे English में Secularism कहा जाता है एक ऐसा शब्द है जिसमे सभी नागरिकों के आत्मचिंतन का सम्मान करने के साथ-साथ उनकी मूल स्वतंत्रता का उद्देश्य निहित है। धर्मनिरपेक्षता किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार देती है कि वह किसी भी धर्म का पालन करने हेतु स्वतंत्र है। धर्मनिरपेक्षता यह सदृढ़ करती है कि किसी व्यक्ति और उसके धर्म के बीच कभी भी कोई शासकीय शक्ति हस्तक्षेप नहीं करेगी। अर्थात भारत या किसी भी धर्मनिरपेक्ष देश की सरकार अपने नागरिकों के धर्म से सबंधित कार्यों में तब तक हस्तक्षेप नही करती जब तक धार्मिक आस्था नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन न कर रही हो। आइए धर्मनिरपेक्षता को विस्तार से समझते हुए इसकी विशेषताएं जानते हैं।

धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रथम प्रयोग तथा आधार भूत जानकारी:
दोस्तों धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम जॉर्ज होलिओक ने वर्ष 19 वीं शताब्दी के मध्य में किया था। इस शब्द का अर्थ है कि भारत का संविधान सभी धर्मों में विश्वास रखता है व भारत का संविधान कभी भी कोई निर्णय धर्म के आधार पर नहीं लेता और यह सभी धर्मों में समान आस्था रखता है। बिना किसी धर्म के आधार पर भेदभाव किए भारत का संविधान सभी धर्मों के लोगों के लिए एक समान है और संविधान भारत में सभी धर्मों के लोगों को एक दृष्टि से देखता है और सभी धर्मों में बराबर विश्वास रखता है। धर्मनिरपेक्ष के स्थान पर संविधान में पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग किया गया है जो नागरिकों की किसी भी धर्म या पंथ को मानने की स्वतंत्रता का पूर्ण समर्थन करता है और अपनी शक्ति का प्रयोग किसी भी तरीके से किसी धर्म के खिलाफ न करने हेतु प्रतिबद्ध है बशर्ते धार्मिक आस्था संविधान में नागरिकों के लिए लिखित किसी भी अधिकार का हनन न करती हो। उदाहरण के तौर पर सती प्रथा या फिर छुआछूत जैसी कुरीतियों को यदि कोई धर्म के साथ जोड़ कर बढ़ावा देने की कोशिश करता है तो राज्य, सरकार और संविधान इसके विरुद्ध अपनी शक्ति का प्रयोग करने हेतु स्वतंत्र हैं क्योंकि ऐसी कुरीतियां जो कभी-कभी धर्म के साथ जोड़ कर प्रचारित की जाती हैं मौलिक अधिकारों का हनन करती है फलस्वरूप इन कुरीतियों को धर्म से अलग करने हेतु शासकीय शक्ति धार्मिक कार्यों में हस्तक्षेप कर सकती है। इसलिए किसी भी नागरिक को नुकसान पहुंचाए बिना या फिर किसी के अधिकारों का हनन किए बिना हर व्यक्ति को निजी तौर पर अधिकार है कि वह कोई भी धर्म अपना सकता है किसी भी धर्म का पालन कर सकता है और धर्म से जुड़ी कोई भी क्रिया निभा सकता है। उदाहरण के तौर पर यदि हम सिख समुदाय को लें तो वे पगड़ी पहनते हैं और धार्मिक चिह्न अपने साथ रखते हैं भारतीय शासकीय शक्तियां इस तरह की निजी धार्मिक मान्यताओं में हस्तक्षेप नहीं करती क्योंकि यह नागरिकों की निजी धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है और धर्मनिरपेक्षता के दायरे में आता है।

जब राज्य किसी भी नागरिक की निजी धार्मिक आस्था में दखलअंदाजी नहीं करता तो यह राज्य की "अहस्तक्षेप की नीति" के अंतर्गत आता है इसी नीति के अंतर्गत राज्य कभी भी किसी पर कोई धर्म नहीं थोपता अर्थात वह किसी भी नागरिक को कभी यह नहीं कहेगा कि वह इस धर्म को स्वीकार करें या इस धर्म को अस्वीकार करे। यह पूर्णतया नागरिक के विवेक पर निर्भर करेगा कि वह कौन सा धर्म अपनाना चाहता है और कौन सी धार्मिक क्रियाएं निभाना चाहता है यद्यपि मूल अधिकारों का हनन न करने से जुड़ी शर्तें यहां भी लागू होती है।

राज्य इस बात पर सदैव तटस्थ रहता है कि वह स्वयं को धर्म से दूर रखेगा और धर्म के आधार पर कभी भी शासन नहीं करेगा यह बात धर्मनिरपेक्षता की विशेषताओं में कही गई है धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएं इस प्रकार हैं:

1. धर्मनिरपेक्षता की पहली विशेषता के अनुसार राज्य सदैव धर्म के प्रति निष्पक्ष रहेगा वह कभी भी किसी भी धर्म का साथ नहीं देगा और ना ही किसी धर्म के विरुद्ध कोई कार्य करेगा।

2. राज्य धर्म विरोधी है और धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के नागरिक बंटवारे का समर्थन नहीं करता। धर्म या जाति किसी भी आधार पर किसी भी नागरिक का कोई भी अधिकार राज्य या शासकीय शक्तियों द्वारा कभी नही छीना जाएगा।

3. राज्य सभी को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है और उनकी इस स्वतंत्रता को बरकरार रखने के लिए हर संभव प्रयास भी करता है।

4. राज्य अपने नागरिकों से धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता यानि कि वह ऐसा कभी नही करेगा कि एक नागरिक को सभी धर्म मानने की अनुमति दें और दूसरे नागरिक को किसी विशेष धर्म से वंचित रखने का प्रयास करे। वह धर्म के आधार पर नागरिकों से कोई भेदभाव नहीं करता। राज्य की नज़र में कोई भी नागरिक किसी भी धर्म में परिवर्तित हो तो भी वह नागरिक ही रहेगा और प्रशासन की तरफ सेे पहले से मिल रहे समान अधिकार ज्यों की त्यों प्राप्त करेगा।

5. राज्य धार्मिक सहिष्णुता के आधार पर चलेगा व हर धर्म के प्रति सहिष्णु रहेगा और मौलिक अधिकारों का हनन नहीं करते हुए होने वाली किसी भी धार्मिक क्रिया से परहेज नहीं करेगा।

धर्म निरपेक्षता और पंथ निरपेक्षता में अंतर:
धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता में अर्थ जाने से पहले आप यह जाने कि धर्म और पंथ में क्या अंतर होता है:

धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता में काफी बारीकी अंतर है क्योंकि धर्म और पंथ शब्द को एक दूसरे के पर्यायवाची के रूप में भी प्रयोग किया जाता है इसीलिए यह अंतर कभी-कभी समझ पाना काफी कठिन हो जाता है लेकिन फिर भी इन दोनों में एक विशेष अंतर है जो इन दोनों शब्दों को बड़े ही ध्यान से समझने के बाद पता चलता है। इसी अंतर के कारण भारत के संविधान में सेकुलरिज्म का हिंदी अर्थ धर्मनिरपेक्षता नहीं बल्कि पंथनिरपेक्षता रखा गया है और संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द न रखने के लिए बहुत तर्क दिए गए क्योंकि धर्मनिरपेक्ष का अर्थ समझने के पश्चात कोई भी सरकार धर्मनिरपेक्ष नही हो सकती।

धर्म का अर्थ: आमतौर पर धर्म शब्द को मजहब या रिलीजन के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाता है लेकिन इस शब्द का वास्तविक अर्थ होता है मनुष्य के मूल कर्तव्य। वेद पुराणों में मनुष्य के 10 धर्म लक्षण अर्थात 10 कर्तव्यों का जिक्र किया गया है जो कि इंसान को निभाने होते हैं और इंसान की जीवन शैली का एक हिस्सा है यदि इंसान इन कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करता तो उसमें और जानवर में कोई फर्क नहीं रहता। धर्म के यह 10 लक्षण इस प्रकार हैं:

* धृति: धृति का अर्थ होता है धैर्य। अर्थात धैर्य रखना मनुष्य धर्म के लक्षणों में प्रथम है मनुष्य का धर्म है कि वह किसी भी कार्य या क्रिया में धैर्य रखे क्योंकि जल्दबाजी का मनुष्यता का लक्षण नहीं है। इसी के अनुसार कभी-कभी कहा जाता है कि जल्दी का काम शैतान का होता है।

* क्षमा: मनुष्य के धर्म का दूसरा लक्षण है क्षमा करना। यह मनुष्य का सर्वोत्तम गुण है कि वह दूसरों की गलतियों को माफ कर देता है और इसी प्रकार वह अपनी गलतियों के लिए भी वह क्षमा का हकदार हो जाता है। इसलिए कहा जाता है क्षमादान महादान।

* दम: यह शब्द मनुष्य के अपने आत्मनियंत्रण के लिए प्रयोग किया जाता है इसके अनुसार मनुष्य का स्वयं पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए उसके अपने विचार भी उसके नियंत्रण में होने चाहिए यह मनुष्यता का गुण है। इसीलिए कहा जाता है की जिसने मन पर नियंत्रण पा लिया उसने सम्पूर्ण संसार पर नियंत्रण पा लिया।

* अस्तेय: अस्तेय अर्थात चोरी न करने की प्रवृत्ति। इंसान के धर्म का चौथा लक्षण है कि वह किसी भी प्रकार की चोरी नहीं करता। इस चोरी में सभी तरह की चोरी आ जाती है चाहे फिर वह वस्तु की चोरी हो, चाहे काम की चोरी हो, चाहे वचन की चोरी हो या फिर मन की चोरी हो। धर्म के अस्तेय लक्षण के अनुसार मनुष्यता का यह धर्म है कि वह कभी चोरी नहीं करता।

* शुचिता: धर्म के पाँचवें लक्षण शुचिता के अनुसार मनुष्य में शुद्धता का समावेश होना चाहिए। चाहे फिर वह शरीर की शुद्धता हो, मन की शुद्धता हो, कर्मों की शुद्धता हो, विचारों की शुद्धता हो, आचरण की शुद्धता हो, कथन की शुद्धता या फिर तन की शुद्धता होम मनुष्य में हर प्रकार की शुद्धता का वास होना चाहिए।

* इन्देय निग्रह: धर्म के छठे लक्षण के अनुसार मनुष्य का अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए। मनुष्य का अपनी पाँच इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए यह मनुष्यता का वह लक्षण है जो सार्वजनिक रूप से दिखाई देता है उदाहरणतः यदि किसी का अपनी नज़रों पर नियंत्रण नही है तो वह सदैव शर्मसार होता है।

* धी: धर्म का सातवां लक्षण मनुष्य की बुद्धि को दर्शाता है। बुद्धिमता मनुष्य की पहचान है और पृथ्वी के समस्त जीवो में मनुष्य एक मात्र ऐसा जीव है जिसे बौद्धिक शक्ति प्राप्त है। यही शक्ति उसे संसार के अन्य जीवों से श्रेष्ठ बनाती है।

* विद्या: धर्म का आठवां लक्षण विद्या है अर्थात विद्या प्राप्त करना। इंसान का धर्म है वह अपने पूर्वजों से विद्या ग्रहण कर आगे अपनी संतानों को देता है और यह मनुष्य का परम् धर्म है जो उसे निभाना चाहिए। विद्या ग्रहण करने व उसे आगे बांटने की प्रवृति ही इंसान को आज इतना प्रबल बना पाई है कि वह संसार के समस्त जीवों पर राज कर रहा है।

* सत्य: धर्म के नौवें लक्षण के अनुसार मनुष्य को सदैव सत्य का साथ देना चाहिए। सत्य बोलना चाहिए और अपने मन में सत्यता पूर्ण विचारों का ही जन्म होने देना चाहिए। सत्यता मनुष्य के धार्मिक लक्षण में शामिल है।

* अक्रोध: धर्म के दसवें लक्षण के अनुसार मनुष्य वही है जो क्रोध से मुक्त होता है। क्रोध ना करना मनुष्य का धर्म है क्योंकि क्रोध बुद्धि हर लेता है तथा क्रोधित मनुष्य और पशु में कोई विशेष अंतर नहीं रहता। इसलिए मनुष्यता अक्रोध का साथ देती है।

यह धर्म के 10 लक्षण है और इन लक्षणों का पालन ही धर्म है। इन लक्षणों के अनुसार चलना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है और कोई भी मनुष्य इनसे निरपेक्ष नहीं हो सकता और मनुष्य जाति में रहते हुए इनसे मुख नही मोड़ सकता। इसलिए धर्मनिरपेक्ष होना एक जानवर बनने के समान है। अब समझते हैं पंथ क्या होता है।

पंथ: पंथ के पर्यायवाची देखे जाएं तो पंथ का अर्थ होता है कोई रास्ता, मार्ग या मजहब। पंथ शब्द उस रास्ते को दर्शाता है जिस पर चलकर हम कुछ विशेष प्राप्त कर सकते हैं इसमें ज्ञान की प्राप्ति, शक्तियों की प्राप्ति, भगवान की प्राप्ति, मन की शांति की प्राप्ति या मोक्ष की प्राप्ति इत्यादि को गिना जा सकता है। इन सब को प्राप्त करने हेतु मनुष्य एक रास्ते को चुनता है और उसी रास्ते को पंथ कहा जाता है विशेषकर इंसान कोई भी पंथ ईश्वर को पाने के लिए चुनता है और जब धीरे-धीरे अन्य लोग भी उस पंथ को मानने लगे तो यह पंथ बड़ा हो जाता है और किसी भी देश की राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

सरकार को इस पंथ पद्दति से निरपेक्ष होना चाहिए अर्थात यदि उसके राज्य या देश में सैकड़ों पंथ हैं तो सरकार जो कि सभी पंथ के लोगों पर शासन कर रही है वह उन सैकड़ों में से किसी भी एक पंथ को विशेषता नहीं दे सकती उसे सभी पंथों को समान मानकर चलना होगा और यही होता है पंथ निरपेक्षता। सरकार पंथनिरपेक्ष हो सकती है परंतु धर्म से निरपेक्ष नहीं हो सकती इसलिए संविधान में धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर पंथ निरपेक्षता का प्रयोग किया गया है।

पंथ निरपेक्षता की आवश्यकता क्यों है?
दोस्तों पंथनिरपेक्षता की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि जब एक देश में सैकड़ों पंथ को मानने वाले लोग रहते हैं तो उस देश में यदि सरकार द्वारा किसी एक पंथ को विशेषता दी जाएगी तो अन्य पंथ सरकार से रुष्ठ हो जाएंगे और ऐसी स्थिति में वह एक अलग सरकार बनाने की मांग करेंगे। यदि इस प्रकार हर पंथ एक अलग सरकार बनाएगा तो कभी भी कोई देश स्थिर नहीं रह पाएगा। क्योंकि पंथ समय के साथ-साथ बढ़ते हैं और एक पंथ की सरकार बन जाने पर उसी पंथ के दो टुकड़े हो सकते हैं जिसमें से फिर से पंथ बनेंगे और नई सरकार की मांग करेंगे। इस प्रकार पूरा संसार या पूरा देश इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाएगा कि आपसी मतभेद होने शुरू हो जाएंगे। इसलिए पंथनिरपेक्षता वाली सरकार के होने की आवश्यकता होती है क्योंकि एक पंथनिरपेक्ष सरकार सभी पंथों को सम्मान मान कर चलती है किसी भी पंथ को कम या ज्यादा नहीं आंकती। और इसके साथ ही सभी पंथ के लोगों में आपसी भाईचारे का भी निर्माण होता है और पंथ की इस एकता से देश का निर्माण होता है। इसलिए यदि कहा जाए कि एक देश का निर्माण करने के लिए पंथनिरपेक्षता का होना अनिवार्य हैं तो यह गलत नहीं होगा।

भारत में धर्मनिरपेक्षता:
भारत एक बहुभाषी देश होने के साथ-साथ यहां पर बहुत से पंथ हैं जो समय के साथ-साथ पनपे हैं। तथा ये पंथ अपने-अपने अनुसार अपनी धार्मिक क्रियाएं करते हैं इसलिए भारत में धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा आजादी के समय से ही मुख्य राजनीतिक विषय रहा है और आजादी के समय ही सेकुलरिज्म का अशुद्ध हिंदी अनुवाद धर्मनिरपेक्षता कर दिया गया था। क्योंकि उस समय सेकुलरिज्म का सटीक हिन्दी अनुवाद नही मिल आया था इसलिए आनन-फानन में नेताओं व मीडिया ने सेकुलरिज्म को हिन्दी में धर्म-निरपेक्ष शब्द बोलना शुरू कर दिया। जिस वजह से धर्मनिरपेक्ष और पंथनिरपेक्ष दोनों शब्द भारत एक दूसरे के पर्याय बन गए। आज भी भारत में धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग अधिक होता है। भारत में बहुत बार राजनीतिक पार्टियां धर्म के आधार पर अपना वोट बैंक स्थापित करने की कोशिश करती हैं। लेकिन भारत के संविधान के कड़े नियमों के अनुसार इस प्रकार से धर्म, पंथ या समुदाय के आधार पर राजनीतिक कर सरकार बनाना लगभग ना के बराबर है। क्योंकि इतने अधिक पंथ होने के कारण भारत में सबको साथ लेकर बढ़ने पर ही सरकार बनाई जा सकती है जिस कारण पंथनिरपेक्ष होकर ही इस देश में शासन चलाया जा सकता है यद्द्पि राजनीतिक दल एक दूसरे पर टीका टिप्पणी करने के लिए इस शब्द का बखूबी प्रयोग करते हैं।

क्या दुनिया के सभी देश धर्मनिरपेक्ष हैं:
यद्यपि धर्मनिरपेक्षता/ पंथनिरपेक्षता किसी भी देश की सफल सरकार चलाने के लिए आज के समय में आवश्यक मानी जाती है लेकिन फिर भी कुछ देश इसके अपवाद हैं खासकर अफ्रीका महाद्वीप के इस्लामिक देशों में एक ही मजहब को तव्वजो दी जाती है तथा उस मजहब के नियमों के अनुसार देश के कानूनों पर प्रभाव पड़ता है इसलिए हम कह सकते हैं कि दुनिया के सभी धर्मनिरपेक्ष नहीं है। वे देश जहां पर बहुभाषी व बहुसंस्कृति के लोग एक साथ मिल-जुल कर रहते हैं वहां पर धरनिरपेक्षता है और स्वाभाविक रूप से पंथों में न उलझने वाले देशों में विकास की गति तीव्र होती है।

निष्कर्ष: अंत में धर्मनिरपेक्षता को पूर्ण रुप से समझने के पश्चात हम ये कह सकते हैं कि यदि संपूर्ण देश के लोगों को समान रुप से विकसित करना है तो पंथ के आधार पर शासन नहीं किया जा सकता। आपके धर्मनिरपेक्षता के बारे में क्या विचार हैं टिप्पणी केे माध्यम से हम तक पहुंचाएं।

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