Sponsored Links

वन बेल्ट वन रोड परियोजना क्या है One Belt One Road in Hindi

वन बेल्ट वन रोड परियोजना अर्थात OBOR चीन की एक महत्वकांक्षी परियोजना है जिसके तहत वह एशिया ही नहीं बल्कि पूरे विश्व पर अपना दबदबा कायम करना चाहता है। चीन का प्रभुत्व जैसे-जैसे एशिया तथा दुनिया में बढ़ता है वैसे-वैसे सबसे बड़ा पड़ोसी देश होने व चीन से पुराने सीमा विवाद होने के कारण भारत पर इस विषय में सोचने का दबाव भी बढ़़ता है इसलिए चीन से जुड़ी कोई भी परियोजना जो भारत पर प्रभाव डालती है उसके बारे में हमें पूरी जानकारी होनी चाहिए। तो चलिए जानते हैं इस योजना से संबंधित कौन से सामान्य ज्ञान प्रश्न बन सकते हैं जो आप को जानकारी देने के साथ-साथ आपकी परीक्षाओं की दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण हैं।

1. वन बेल्ट वन रोड का पुराना नाम क्या था?
द आशिअंट सिल्क रोड (The Acient Silk Road) (इस प्राचीन रोड के पदचिह्नों को पुनर्जीवित करने के लिए ही चीन वन बेल्ट वन रोड परियोजना लेकर आया है।)

2. इस रोड का पुराना नाम सिल्क रूट क्यों पड़ा?
क्योंकि इस रूट के जरिए चीन मध्य एशिया व यूरोप से सिल्क व्यापार किया करता था।

3. वन बेल्ट वन रोड को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
यह दो मार्गों पर बनाया जा रहा है पहला भू-मार्ग पर तथा दूसरा जल मार्ग पर। भू-मार्ग का हिस्सा "सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट" कहलाता है और जल मार्ग को "मेरीटाइम सिल्क रोड" कहा जाता है इन दोनों का सयुंक्त रूप वन बेल्ट वन रोड कहलाता है।

4. वन बेल्ट वन रोड को बनाए जाने की घोषणा चीन द्वारा कब की गई थी?
इस रोड को बनाए जाने की घोषणा सितंबर 2013 में चीन के आजीवन राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा की गई थी।

5. यह रोड कहां से कहां तक जाता है?
यह रोड चीन से शुरू होकर जमीनी और जल दोनों मार्गो से होते हुए यूरोप में जाकर समाप्त होता है।

6. यह रोड चीन के किस स्थान से आरंभ होता है?
भू-मार्ग: शिनजियांग (Xinjiang) से
जल मार्ग: फुजियान (Fujian) से

7. दक्षिण एशिया के कितने देश हैं जो इस परियोजना के दायरे में आते हैं?
इस रोड के दायरे में दक्षिण एशिया के भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, मालदीव और भूटान देश आते हैं।

8. इस योजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
चीन और यूरेशिया को आपस में जोड़ना तथा बीच में आने वाले सभी देशों के बाजारों तक अपना सामान पहुँचाना ताकि चीन की आर्थिक व्यवस्था सुदृढ हो सके।

9. क्या इससे भारत को कोई लाभ होगा?
यह परियोजना चीन के साथ साथ भारत की इकोनॉमी में भी बहुत अधिक तीव्रता ला सकती है लेकिन फिलहाल भारत और चीन के मध्य कुछ असहमतियां होने के कारण भारत इस परियोजना में शामिल नहीं हुआ है। हालांकि यदि आने वाले समय में भारत और चीन की इस परियोजना में शामिल हुआ तो चीन और भारत के मध्य विश्वास बढ़ेगा और दोनों देशों के मध्य लंबे समय से चल रहे सीमा विवाद (जो कि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में है) का भी कोई समाधान निकल सकता है।

10. भारत को इस परियोजना में क्यों शामिल नहीं होना चाहता?
चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) व स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स के चलते

11. चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) क्या है?
यह एक कोरिडोर अर्थात गलियारा है जो चीन के काशगर को पाकिस्तान के ग्वादर से जोड़ता है। यह 2,442 किलो मीटर लंबा कॉरिडोर पूरे पाकिस्तान को पार करता है तथा चीन की पहुँच सीधे अरब सागर तक बनाता है।

12. स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स क्या है?
String of Pearls मोतियों की माला के आकार का बना एक समुंद्री रुट है जिसके जरिए चीन हिंद महासागर से होते हुए अफ्रीकी देशों तक अपनी पहुँच बनाता है भारत की दृष्टि से इस मार्ग की सबसे मुख्य बात यह है कि यह मार्ग भारत को समुंद्री रास्ते से घेरता है और भारत के समुंद्री मार्ग को प्रतिबंधित करता है। इस पर्ल्स के अंतर्गत चीन की नौसैनिक बल से युक्त बन्दरगाहें आती हैं जो कि ग्वादर (पाकिस्तान), माले (मालदीव), हबनटोटा (श्रीलंका), चितगोंग (बांग्लादेश), सितवे (म्यांमार) और कोको आइलैंड (म्यांमार) में स्थित हैं। हालांकि वर्तमान समय में चीन इन्हें व्यापार के उद्देश्य से प्रयोग करता है लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वह युद्ध जैसी स्थिति में यहाँ अपना सैन्य बल स्थापित कर सकता है इसलिए यह भारत के लिए चिंता का विषय है।

13. क्या भारत उपरोक्त दो समस्याओं को छोड़कर चीन की इस परियोजना से पूरी तरह सहमत है?
उपरोक्त दो समस्याएं मुख्य है लेकिन इसके अतिरिक्त भी भारत इस परियोजना से सबंधित कुछ मुद्दों पर असहमति दर्शाता है और क्योंकि भारत दक्षिण एशिया में एकमात्र ऐसा देश है जो चीन को टक्कर दे सकता है इसलिए वह पुरजोर से अपनी असहमति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रख सकता है। जैसे कि चाइना द्वारा इस परियोजना पूरी डिटेल सार्वजनिक न करना, हिंद महासागर में चाइना द्वारा अपना वर्चस्व बढ़ाने की कोशिश करना, भारत की भौगोलिक सुरक्षा में सेंध लगाना इत्यादि भारत की असहमति के विशेष कारण हैं।

14. चीन ने इस परियोजना को पूरा करने के लिए कितनी लागत को मंजूरी दी है?
वर्तमान में 160 बिलियन अमेरिकी डॉलर का खर्च इस परियोजना पर आ चुका है चीन 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक खर्च कर इस परियोजना को पूरा करना चाहता है।

15. चीन इतनी बड़ी वैश्विक परियोजना के लिए पैसा कहां से जुटाता है?
चीन इस परियोजना को पूरा करने के लिए कुछ पैसा अपने सिल्क रोड फंड से खर्च करता है, इसके अलावा चाइना डेवलपमेंट बैंक, एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक और जिन देशों में वह इस कॉरिडोर की पहुँच बनाता है उनसे पार्टनरशिप में इस योजना के लिए सहायता प्राप्त करता है।

16. चीन यूरेशिया और अफ्रीकी देशों तक अपनी पहुँच क्यों बढ़ाना चाहता है?
चीन अपनी मार्किट को वैश्विक स्तर तक फैलाना चाहता है इसके लिए यदि वह वायु मार्ग का प्रयोग करता है तो उसे खर्चा भी ज्यादा आता है और वह दूसरे देशों की मार्केट में अपना सामान सस्ते में उपलब्ध नहीं करवा सकता जिस कारण इनकी बिक्री ज्यादा नही होती। यदि चीन इस परियोजना को पूरा करने में सफल हो जाता है तो वह बहुत ही कम समय में और बहुत ही कम खर्च में अपना सामान दूसरे देशों के बाजारों तक पहुँचा सकेगा जो चीन की इकोनॉमी में जबरदस्त इजाफा करेगा। विकसित देशों के बाजार की तरफ ध्यान न देकर चीन उन देशों के बाजार की तरफ अधिक ध्यान दे रहा है जो अभी विकास के आरंभिक बिंदु पर हैं और मध्य अफ्रीका के ज्यादातर देशों में विकास बिल्कुल आरंभिक स्तर पर है इसलिए चीन इन देशों के बाजार पर अपना व्यापारिक नियंत्रण चाहता है ताकि उसका बाजार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय तक टिका रहे। यही कारण है कि वह वन बेल्ट वन रोड परियोजना को पूरा करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है।

17. क्या इस समय चीन अपना सामान सिर्फ वायु मार्ग से भेजता है?
यह पूरी तरह से उसे देश की भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है जहां चीन अपना सामान भेजना चाहता है। यदि चीन और समान आयात करने वाले देश के बीच कोई ऐसा देश आता है जो चीन को अपने जमीनी मार्गों का प्रयोग नहीं करने देना चाहता तो सम्भवतः ही चीन को समुद्री मार्ग देखना पड़ेगा यदि समुद्री मार्ग से कोई रास्ता नहीं जा रहा है और समुद्री मार्ग से जाना भी असंभव है तो वह मजबूरीवश हवाई मार्ग से अपना सामान भेजता है। इसलिए यदि यह परियोजना पूरी हो जाती है तो एशिया के ज्यादातर देशों तक चीन की भू-क्षेत्र के जरिए पहुँच हो जाएगी और यूरोप, एशिया और अफ्रीका के किसी भी देश का बाजार उसकी पहुँच से ज्यादा दूर नहीं रहेगा। उदाहरण के तौर पर उत्तर चीन और ड्यूजबर्ग, जर्मनी के मध्य चल रही रेल का उदाहरण लिया जा सकता है जो 13 से 14 दिन का समय लगा कर चीन का समान रेल मार्ग के रास्ते जर्मनी पहुँचाती है जो बहुत कम लागत में, बहुत जल्दी व बड़ी आसानी से सामान का आदान-प्रदान करने में चीन को सक्षम बनाती है।

18. वन बेल्ट वन रोड परियोजना के चलते चीन कुल कितने गलियारे (कॉरिडोर) बनाएगा?
छः गलियारे

19. इस परियोजना के अंतर्गत आने वाले इन गलियारों का क्या नाम है?
(i). चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा
(ii). न्यू यूरेशियन लैंड ब्रिज
(iii). चीन - मध्य एशिया - पश्चिम एशिया आर्थिक गलियारा
(iv). चीन - मंगोलिया - रूस आर्थिक गलियारा
(v). बांग्लादेश - चीन - भारत - म्यांमार आर्थिक गलियारा
(vi). चीन - इंडोचाइना - प्रायद्वीप आर्थिक गलियारा

20. दुनिया के कुल कितने देश इस परियोजना के अंतर्गत आने वाले जल या भू-मार्ग के दायरे में आते हैं?
लगभग 65 देश (यह सँख्या परियोजना में बदलावों व विकास के चलते समय के साथ कम या ज्यादा हो सकती है) इतने अधिक देशों को एक साथ लेकर चलने वाली इस परियोजना को सदी की सबसे बड़ी परियोजना माना जा रहा है।

21. यह परियोजना विश्व की कितनी जनसँख्या तक चीन की पहुँच बनाएगी?
लगभग आधी जनसँख्या (4.4 अरब) तक

22. इस परियोजना के कब तक पूरे होने की संभावना है?
माना जा रहा है कि यह परियोजना वर्ष 2050 तक पूरी हो जाएगी।

Sponsored Links

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें