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सबसे महंगी करेंसी किस देश की है

कुवैती दीनार को दुनिया की सबसे महंगी करेंसी होने का तमगा प्राप्त है कुवैती दीनार की कीमत कितनी महंगी है इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि 1 कुवैती दिनार की कीमत 250 भारतीय रुपयों के आस-पास रहती है। वहीं अमेरिकी डॉलर व यूरो के मुकाबले भी यह करेंसी 3 गुना अधिक शक्तिशाली है। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर कुवैत की करेंसी इतनी महंगी क्यों है? इसका कारण है कुवैती तेल भंडार। कुवैत पूरी दुनिया के 10 प्रतिशत तेल भंडार का मालिक है जिस कारण यह दूसरे देशों से जिन वस्तुओं का आयात करता है उनकी कीमत इसके द्वारा निर्यात किए जाने वाले तेल के सामने कुछ भी नहीं है। इस प्रकार ऑयल रिजर्व कुवैती अर्थव्यवस्था की रीड की हड्डी हैं तथा कुवैती मुद्रा को दुनिया की सबसे महंगी करेंसी बनाने के लिए जिम्मेवार हैं हालांकि यहाँ अन्य कारण भी हैं जो इस मुद्रा की उच्चतम दर के कारण हैं जैसे कुवैत को फिक्स करेंसी वैल्यू पॉलिसी इत्यादि।

कुवैती दिनार के इतने महंगे होने के कारण इसे 1000 फिल्स में बांटा गया है ठीक वैसे ही जैसे भारतीय रुपए को 100 पैसों में बांटा गया है वहीं कुवैती दिनार को 1000 फिल्स में बांटा गया है। जहां भारत में छोटा नोट 01 रुपए का होता है, वहीं कुवैती दिनार में सबसे छोटा नोट एक चौथाई कुवैती दीनार का होता है इसके बाद आधा दिनार का नोट भी कुवैत में चलता है। इसके अलावा कुवैत में आमतौर पर प्रयोग होने वाले नोट की अधिकतम वैल्यू 20 दीनार तक रहती है इसके आगे के नोटों का वहां कोई विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती। वहीं यदि सिक्कों की बात की जाए तो कुवैत में चलने वाले सिक्के 01, 05, 10, 20, 50 व 100 फिल्स के होते हैं अर्थात 100 फिल्स का सिक्का एक दीनार का दसवां भाग होता है। कुवैती दीनार का प्रयोग केवल कुवैत के अंदर ही होता है अनाधिकारिक रूप से इसका प्रयोग कोई अन्य देश नहीं करता। या नाम मात्र करता है इसका कारण है कुवैती दीनार का उच्चतम मूल्य।

कुवैती दिनार सेंट्रल बैंक ऑफ कुवैत द्वारा जारी किया जाता है तथा वर्ष 1960 में कुवैत में दीनार को अपनी करेंसी के रूप में अपनाया था। इससे पहले कुवैत में खाड़ी रूपया चला करता था जिसे भारत सरकार के अंतर्गत "रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया" द्वारा जारी किया जाता था। एक खाड़ी रुपए की कीमत 01 भारतीय रुपए के बराबर रखी गई थी। लेकिन वर्ष 1960 में कुवैत ने खाड़ी रुपए को जगह दीनार को अपनी करेंसी बना लिया तथा एक कुवैती दीनार की कीमत 13 रुपए के लगभग रखी गई। जहां कुवैत के तेल भंडार इसकी शक्ति बने हैं वहीं एक समय ऐसा भी आया था जब कुवैती अर्थव्यवस्था को हड़पने का लालच में इसके पड़ोसी देश इराक ने इस पर हमला कर दिया था।

इराक ने वर्ष 1990 में कुवैत पर हमला किया तथा कुवैती दिनार को अपनी करेंसी के रूप में अपना लिया। उस समय कुवैती दीनार की जमकर लूट हुई। फलस्वरूप वर्ष 1991 में अमेरिका को आगे आकर आजादी की लड़ाई में कुवैत का साथ देना पड़ा व कुवैत को इराक के कब्जे से आजाद करवाया। लेकिन उस समय तक कुवैती दीनार को जमकर लूटा जा चुका था इसलिए पुराने दीनारी नोटों को बंद कर दिया गया। ठीक वैसे ही जैसे भारत में नोटबंदी के पश्चात पुराने नोट बंद हुए हैं। इसके बाद कुवैत में पुरानी मुद्रा की जगह नए बैंक नोट जारी किए गए। उस समय से लेकर आज तक कुवैत कुल 6 बार अपनी मुद्रा के नोटों की नई सीरीज निकाल चुका है।

कुवैत ने अपनी आजादी का जश्न मनाने के लिए "पॉलीमर बैंकनोट" भी जारी किए। जो इसके आजाद होने के 2 वर्ष पश्चात 1993 में तथा वर्ष 2001 में भी जारी किए गए थे। कुवैत पर आई इस विपत्ति के बावजूद भी आज तक कुवैती दीनार स्वयं को दुनिया की सबसे महंगी करेंसी के रूप में स्थापित किए रहने में सक्षम है। कुवैती करेंसी का इतिहास खाड़ी देशों की करेंसी से मिलता जुलता है जो पहले गरीब हुआ करते थे लेकिन जैसे ही इन देशों को अपनी जमीन के नीचे तेल के भंडारों का पता चला तो इनकी अर्थव्यवस्था में अचानक एक भारी उछाल देखा गया। जिसने इन देशों की अर्थव्यवस्था को एक ऊँचाई दी व इन्हें अमीर देश बनाने में सहायता की।

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