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चंपारण आंदोलन कब हुआ था?

महात्मा गांधी वर्ष 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत वापिस लौट चुके थे। गांधी जी के भारत लौटने के बाद उन्होंने 01 वर्ष तक भारत का भ्रमण किया और लोगों की समस्याओं को समझने का प्रयास किया। साथ ही यह भी समझा कि यहां पर किस प्रकार की राजनीति चल रही है और किस प्रकार की व्यवस्थाएं हैं और वे क्या समस्याएं हैं जिनसे लोगों को छुटकारा मिलना चाहिए उनके इसी भ्रमण के चलते बिहार के एक ग्राम वासी राजकुमार शुक्ला ने उन्हें चंपारण में आमंत्रित किया तथा उन्हें बताया कि चंपारण में किसानों से जबरदस्ती नील की खेती करवाई जा रही है तथा उनका आर्थिक शोषण किया जा रहा है।

उस समय चंपारण में तीन कठिया प्रथा प्रचलित थी जिसके अनुसार किसानों को मजबूरी वश अपनी 01 एकड़ (20 कट्ठे) की जमीन में से 03 कट्ठों पर नील की खेती करनी पड़ रही है। क्योंकि नील की मांग बाजार में थी इसलिए जमीदार व ब्रिटिशर्स अपने लाभ के लिए इसका प्रयोग करते थे जबकि किसानों को इससे कोई लाभ नहीं होता था। इसके बाद जब नील की मांग बाजार में कम हुई और जर्मन रंगों का प्रयोग किया जाने लगा तो जमीदारों ने किसानों से नील की खेती बंद करवा दी तथा इसके स्थान पर स्वयं का आर्थिक लाभ उठाना शुरू कर दिया। उन्होंने किसानों से कर वसूलना व अन्य तरीकों से उनका आर्थिक शोषण करना शुरू कर दिया। किसानों के इसी शोषण के विरुद्ध महात्मा गांधी ने वर्ष 1917 में चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत की। यह सत्याग्रह एक सफल सत्याग्रह साबित हुआ। इसी सत्याग्रह के चलते चंपारण के किसानों को अपनी जमीन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हुआ और उनका आर्थिक शोषण समाप्त हो गया। इस सत्याग्रह को भारत में महात्मा गांधी की पहली जीत के रूप में देखा जाता है।

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