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असहिष्णुता क्या है?

जब कोई व्यक्ति अपने मन में ऐसे विचार उत्पन्न कर लेता है जो उसे सर्वश्रेष्ठ होने का अनुभव करवाते हैं और जब वह अन्य व्यक्तियों को बिना कोई विचार किए निम्न कोटि का समझने लगता है तथा उनके द्वारा किए जाने वाले किसी भी कृत्य का बिना सोचे समझे विरोध करने लगता है तो हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति असहिष्णु हो चुका है। प्रत्येक व्यक्ति में सोचने समझने की क्षमता होती है यद्द्पि प्रत्येक व्यक्ति का सोचने समझने का तरीका अलग हो सकता है प्रत्येक मनुष्य अपने पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है इसलिए सोचने के तरीके में अंतर होना कोई बड़ी बात नही। कोई व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म में पैदा हुआ हो उसे पूर्ण अधिकार है कि वह अपने धार्मिक कृत्यों को निभा सके। कोई अन्य धर्म का व्यक्ति उसे वह कृत्य करने से तब तक नही रोक सकता जब तक वह कृत्य उसे कोई निजी हानि न पहुँचा रहा हो। बिना किसी कारण के केवल अपनी पसंद ना पसंद के आधार पर किसी व्यक्ति को धार्मिक कृत्य करने से रोकना हमारी असहिष्णुता को दर्शाता है।

असहिष्णुता का अर्थ होता है सहन न करना या सहनशक्ति का न होना। किसी भी समाज के बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि उस समाज में रहने वाले व्यक्ति एक दूसरे के प्रति सहिष्णु बने। क्योंकि विविधता में भी एकता पाई जाती है प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी स्तर पर अलग हो सकता है या अपने अलग विचार रख सकता है लेकिन उसकी आंतरिक भावना किसी को आहत करने की नहीं होनी चाहिए। यदि उसे कोई विचार पसंद नहीं आता तो केवल द्वेष की भावना के आधार पर उस विचार को स्थगित कर देना असहिष्णुता की निशानी है। हमें प्रयास करना चाहिए कि हम एक ऐसे व्यक्ति बने जो सहिष्णु हो और विविधता को पसंद करते हों।

सहिष्णुता सज्जन व्यक्तियों की निशानी होती है और सहिष्णु होकर ही हम एक स्वच्छ, सुरक्षित व एकता में विश्वास रखने वाले समाज का निर्माण कर सकते हैं। भारत जैसा देश जहां पर विविधता में एकता है ऐसे भव्य देश के नागरिक होते हुए यह हमारा कर्तव्य भी है और प्रकृति भी।

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