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काला पानी की सजा क्या है तथा यह कब शुरू की गई थी

काला पानी की सजा ब्रिटिश काल में भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को दी जाने वाली सबसे भयावह सजाओं में से एक थी। इस सजा के अंतर्गत अंग्रेजी सरकार का विरोध करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को उम्र भर के लिए काले पानी की सजा दे दी जाती थी ताकि उनके विरोध के कारण जो प्रभाव जनता पर पड़ा है वह पूर्णतः समाप्त हो सके तथा आगे से कोई सरकार का विरोध करने की कोशिश न करे। जिस विरोधी को यह सजा सुना दी जाती थी उसे अंडमान निकोबार की सेल्युलर जेल में कैद कर दिया जाता था और क्योंकि प्रत्येक कैदी को अलग बैरक में रखा जाता था इसलिए उम्र भर का यह अकेलापन अंदर ही अंदर घूट कर मरने पर कैदी को मजबूर कर देता था। काले पानी की इस सजा की शुरुआत वर्ष 1857 में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद से हुई थी। पहली बार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े ब्रिटिश सरकार का विरोध करने वाले 200 कैदियों को जेलर डेविड बेरी की कस्टडी में काले पानी की सजा सुनाई गई थी।

यदि अंडमान निकोबार द्वीप समूह को विश्व मानचित्र में देखा जाए तो आप पाएंगे कि ये द्वीप पूर्णतः समुंद्र में उभरे हुए हैं तथा चारों ओर से समुंद्री पानी से घिरे हुए हैं। इतने विशाल समुंद्र से घिरे होने के कारण यहाँ से कैदियों का भागना नामुमकिन था। जेलर जानते थे कि इस जेल से भागने का कोई रास्ता नही है इसलिए बिना किसी भय के जेल की चारदीवारी की ऊंचाई कम रखी गई थी जिसे कूद कर पार करना बहुत ही आसान था। बहुत से कैदियों ने इसे फांद कर भागने की कोशिश भी की थी परन्तु क्योंकि इसके सैंकड़ो किलोमीटर दूर तक केवल पानी ही पानी था इसलिए या तो कैदी थक कर पानी में डूब जाते थे या फिर जेलर द्वारा पुनः पकड़ लिए जाते थे। इस प्रकार हर स्थिति में काले पानी का सीधा अर्थ था धीरे-धीरे परन्तु निश्चित भयावह मृत्यु।

क्या है: उम्र कैद; जिससे बचकर भागना असंभव था तथा मृत्यु निश्चित थी
कब शुरू की गई: 1857 में
जेल कब बनी: 1906 में
कहाँ दी जाती थी: अंडमान निकोबार
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